मोगादिशु, 17 अगस्त 2026 : पाकिस्तान और सोमालिया के बीच हुए रक्षा समझौते ने हॉर्न ऑफ अफ्रीका और हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। चार अगस्त को दोनों देशों ने द्विपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत आतंकवाद-रोधी अभियानों, सैन्य प्रशिक्षण, अनुभव और तकनीकी जानकारी साझा करने के साथ क्षमता निर्माण में सहयोग की बात कही गई है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब हॉर्न ऑफ अफ्रीका में कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं। सोमालिया की रणनीतिक स्थिति इसे भारत, चीन, तुर्की और खाड़ी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती है।
क्यों अहम है सोमालिया ?
सोमालिया हॉर्न ऑफ अफ्रीका में स्थित है और इसकी लंबी समुद्री सीमा अदन की खाड़ी तथा हिंद महासागर से जुड़ती है। यह क्षेत्र एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों के करीब है। बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी इसी व्यापक समुद्री क्षेत्र का हिस्सा है, जिसके जरिए लाल सागर और आगे स्वेज नहर तक पहुंच बनती है। यही वजह है कि सोमालिया में किसी भी बाहरी देश की सैन्य या रणनीतिक मौजूदगी को व्यापक समुद्री सुरक्षा के नजरिए से देखा जाता है।
हॉर्न ऑफ अफ्रीका में क्यों बढ़ाना चाहता है पाकिस्तान प्रभाव ?
पाकिस्तान की हॉर्न ऑफ अफ्रीका में मौजूदगी नई नहीं है। 1990 के दशक में सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र के अभियान के दौरान पाकिस्तानी सेना ने अहम भूमिका निभाई थी। पाकिस्तानी सैनिक 1995 में मोगादिशु से लौटने वाले अंतिम अंतरराष्ट्रीय दलों में शामिल थे। अब रक्षा समझौते से पाकिस्तान इस क्षेत्र में अपने सैन्य और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान की तुर्की और सऊदी अरब के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी को इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।
सोमालिया को पाकिस्तान से क्या फायदा ?
सोमालिया लंबे समय से आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता और समुद्री सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग से उसे सैन्य प्रशिक्षण, आतंकवाद-रोधी अभियानों में अनुभव और रक्षा क्षमता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। पाकिस्तान के JF-17 लड़ाकू विमान में सोमालिया की रुचि की भी चर्चा है। यदि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग आगे बढ़ता है, तो भविष्य में सैन्य उपकरणों और प्रशिक्षण से जुड़े समझौते भी सामने आ सकते हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह डील ?
भारत के लिए इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी भौगोलिक स्थिति है। सोमालिया हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से में स्थित है और इसके आसपास के समुद्री रास्ते भारत के पश्चिमी व्यापारिक नेटवर्क के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि पाकिस्तान इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक या सैन्य गतिविधियां बढ़ाता है, तो भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान को पश्चिमी हिंद महासागर में अपनी निगरानी और समुद्री सुरक्षा रणनीति पर अतिरिक्त ध्यान देना पड़ सकता है। हालांकि, केवल रक्षा समझौते के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सोमालिया में पाकिस्तान को स्थायी सैन्य अड्डा मिलने जा रहा है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार समझौते का मुख्य फोकस आतंकवाद-रोधी सहयोग, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर है।
चीन और तुर्की की मौजूदगी भी अहम
हॉर्न ऑफ अफ्रीका पहले से ही कई देशों की रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र है। चीन की जिबूती में सैन्य मौजूदगी है, जबकि तुर्की ने भी सोमालिया के साथ अपने रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। खाड़ी देशों की भी इस क्षेत्र में आर्थिक और सुरक्षा संबंधी रुचियां हैं। ऐसे में पाकिस्तान की नई रक्षा साझेदारी क्षेत्र के बदलते रणनीतिक समीकरण में एक और महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ सकती है।
क्या हिंद महासागर में बढ़ेगा दबाव ?
पाकिस्तान-सोमालिया रक्षा समझौता भारत के लिए तत्काल सैन्य खतरे का संकेत नहीं है, लेकिन यह पश्चिमी हिंद महासागर में बदलते रणनीतिक समीकरण पर नजर रखने की जरूरत जरूर बढ़ाता है। आने वाले समय में यह महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग केवल प्रशिक्षण और आतंकवाद-रोधी गतिविधियों तक सीमित रहता है या इसमें नौसैनिक सहयोग, सैन्य उपकरण और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्र भी शामिल होते हैं।




