रांची | 9 जुलाई 2026

झारखंड हाई कोर्ट ने रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) परिसर के पास अतिक्रमण हटाने के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में आदिवासी नेत्री निशा भगत को बड़ी राहत देते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है। अदालत के इस फैसले से गिरफ्तारी की आशंका पर फिलहाल रोक लग गई है। यह मामला रिम्स परिसर के समीप जिला प्रशासन द्वारा चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है।

सरकारी कार्य में बाधा डालने का था आरोप

रिम्स परिसर के आसपास अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच विरोध की स्थिति उत्पन्न हुई थी। आरोप है कि इस दौरान सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई गई, जिसके बाद पुलिस ने निशा भगत सहित कई लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए निशा भगत ने झारखंड हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अग्रिम जमानत की मांग की। सुनवाई के बाद अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली।

आदिवासी अधिकारों की मुखर आवाज रही हैं निशा भगत

निशा भगत लंबे समय से आदिवासी समुदाय के अधिकारों, विस्थापन, भूमि और सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रिय रही हैं। विभिन्न आंदोलनों और जनहित के मामलों में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। हाई कोर्ट से मिली अग्रिम जमानत को उनके समर्थक बड़ी कानूनी राहत के रूप में देख रहे हैं।

अलकतरा घोटाले में तीन आरोपियों को भी मिली राहत

इसी दौरान झारखंड हाई कोर्ट ने वर्ष 2009 के चर्चित अलकतरा घोटाले में भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने पूर्व सहायक अभियंता उपेंद्र कुमार सिंह, उमेश पासवान और राजबली राम को सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायमूर्ति राजेश कुमार की एकलपीठ ने वर्ष 2019 में सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त करते हुए तीनों की आपराधिक अपील स्वीकार कर ली।

2019 की सजा रद्द, सीबीआई केस में मिला लाभ

सीबीआई ने वर्ष 2009 में अलकतरा खरीद में कथित अनियमितता, फर्जीवाड़ा और सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला दर्ज किया था। जांच के बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया था। वर्ष 2019 में विशेष अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद दोषसिद्धि को निरस्त करते हुए तीनों को बरी कर दिया। इस फैसले को झारखंड के चर्चित मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है।