रक्षाबंधन पर झारखंड में पेड़ों को राखी बांधने की अनोखी परंपरा, प्रकृति की रक्षा का लिया जाता है संकल्प
जमशेदपुर, 18 अगस्त। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प से जुड़ा है, लेकिन झारखंड में इस पर्व का एक अनोखा रूप देखने को मिलता है। पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया स्थित सुनसुनिया जंगल में रक्षाबंधन के अवसर पर आदिवासी महिलाएं साल के पेड़ों को राखी बांधकर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेती हैं। इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा।
साल के पेड़ों को राखी बांधती हैं महिलाएं
सुनसुनिया जंगल में रक्षाबंधन के दिन बड़ी संख्या में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचती हैं। यहां पेड़ों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। महिलाएं साल के पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधकर जंगल और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संकल्प लेती हैं। इस परंपरा से जुड़ा आयोजन पद्मश्री जमुना टुडू के नेतृत्व में भी आयोजित किया जाता रहा है।
मांदर-धमसे की थाप पर दिखती है लोक संस्कृति
रक्षाबंधन के मौके पर सुनसुनिया जंगल का माहौल उत्सव में बदल जाता है। महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए जंगल पहुंचती हैं। मांदर और धमसे की थाप के बीच लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इस दौरान आदिवासी समाज की समृद्ध परंपरा और प्रकृति से उसके गहरे रिश्ते की झलक दिखाई देती है।
राखी के बाद पेड़ों की आरती
पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधने के बाद उनकी आरती भी उतारी जाती है। यह रस्म पेड़ों के प्रति सम्मान और उनके संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है। ग्रामीण महिलाएं जंगल की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए पेड़ों की कटाई के खिलाफ भी जागरूकता फैलाती हैं।
इंसानों से आगे प्रकृति तक पहुंचा रक्षा का भाव
रक्षाबंधन में रक्षा सूत्र सुरक्षा और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। झारखंड की यह परंपरा इसी भावना को प्रकृति से जोड़ती है। भाई की कलाई पर बांधी जाने वाली राखी जहां रिश्ते की रक्षा का संदेश देती है, वहीं पेड़ को बांधी गई राखी पर्यावरण बचाने का संकल्प बन जाती है।
परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
झारखंड की यह परंपरा आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के बीच मजबूत संबंध को सामने लाती है। रक्षाबंधन के बहाने ग्रामीण समाज लोगों को यह संदेश भी देता है कि जंगल और पेड़ों की रक्षा करना आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है। यही वजह है कि सुनसुनिया जंगल की यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण बन गई है।




