नई दिल्ली | 17 जुलाई 2026

भारत में पूजा-पाठ के दौरान अगरबत्ती जलाना एक आम परंपरा बन चुकी है। अधिकांश घरों और मंदिरों में पूजा के समय सुगंधित अगरबत्ती का उपयोग किया जाता है। हालांकि, धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय मान्यताओं में इस विषय पर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं। कई विद्वानों का मानना है कि प्राचीन ग्रंथों में धूप, गुग्गुल, लोबान और कपूर का उल्लेख मिलता है, जबकि आधुनिक अगरबत्ती का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए पारंपरिक पूजा-पद्धति में प्राकृतिक धूप को अधिक उपयुक्त माना जाता है।

अगरबत्ती को लेकर क्या हैं धार्मिक मान्यताएं?

कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाजार में मिलने वाली अधिकांश अगरबत्तियां बांस की पतली लकड़ी पर तैयार की जाती हैं। कई परंपराओं में बांस को जलाना शुभ नहीं माना जाता। इसी आधार पर कुछ विद्वान पूजा में बांस से बनी अगरबत्ती के बजाय प्राकृतिक धूप के उपयोग की सलाह देते हैं। हालांकि, इस विषय पर सभी परंपराओं और धर्माचार्यों की राय एक जैसी नहीं है और अलग-अलग मत प्रचलित हैं।

स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार में उपलब्ध कई अगरबत्तियों में कृत्रिम सुगंध, रसायन और सिंथेटिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इनके धुएं से कुछ लोगों को एलर्जी, आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ या अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों का चयन करना और बंद कमरे में अधिक मात्रा में धुआं होने से बचना जरूरी है।

प्राकृतिक धूप हो सकती है बेहतर विकल्प

यदि आप पारंपरिक पूजा-पद्धति का पालन करना चाहते हैं, तो गुग्गुल, लोबान, कपूर, जड़ी-बूटियों या प्राकृतिक धूप का उपयोग बेहतर विकल्प माना जाता है। ये सामग्री लंबे समय से धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा रही हैं। साथ ही, पूजा के दौरान घर में पर्याप्त वेंटिलेशन बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि धुएं का प्रभाव स्वास्थ्य पर कम पड़े। धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।