नई दिल्ली, 30 अगस्त। गणेश उत्सव 2026 की तैयारियां शुरू हो गई हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार गणेश उत्सव भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तक चलता है। इस दौरान भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा, प्रतिमा स्थापना और फिर विसर्जन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणपति की आराधना से विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

2026 में कब से शुरू होगा गणेश उत्सव?

पंचांग के अनुसार इस वर्ष गणेश उत्सव की शुरुआत 14 सितंबर से होगी और प्रतिमा विसर्जन 25 सितंबर 2026 को किया जाएगा। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे से शुरू होने की जानकारी दी गई है। वहीं चतुर्दशी तिथि 25 सितंबर की रात 11:06 बजे समाप्त होगी। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर संभव है।

गणेश चतुर्थी पर पूजा का शुभ मुहूर्त

गणेश चतुर्थी के दिन मध्याह्न पूजा का शुभ समय सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक बताया गया है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा कर सकते हैं।

मिट्टी की मूर्ति को माना जाता है शुभ

गणेश उत्सव के लिए मिट्टी से बनी प्रतिमा स्थापित करना धार्मिक परंपरा में शुभ माना जाता है। प्रतिमा लेते समय उसकी सूंड की दिशा का भी ध्यान रखा जाता है। मान्यता के अनुसार बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली गणेश प्रतिमा को घर की पूजा के लिए शुभ माना जाता है।

प्रतिमा के स्वरूप का रखें ध्यान

गणेश जी की प्रतिमा में उनका वाहन मूषक और मोदक दिखाई देना शुभ माना जाता है। बैठी हुई मुद्रा वाली प्रतिमा को भी घर में स्थापना के लिए मंगलकारी माना जाता है।

किस दिशा में करें गणेश जी की स्थापना?

वास्तु परंपराओं के अनुसार गणेश प्रतिमा को पूर्व, उत्तर या ईशान कोण में स्थापित करना शुभ माना जाता है। पूजा करते समय श्रद्धालु का मुख उत्तर दिशा की ओर होना भी शुभ माना जाता है।

दूर्वा और फूल पूजा में जरूरी

भगवान गणेश को लाल या पीले फूल अर्पित करने की परंपरा है। गुड़हल के फूल के साथ दूर्वा चढ़ाना भी विशेष माना जाता है। वहीं, धार्मिक परंपरा में गणेश पूजा के दौरान तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल नहीं करने की मान्यता है।

मोदक का लगाएं भोग

गणपति पूजा में मोदक का विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा मोतीचूर के लड्डू का भोग भी लगाया जा सकता है। मान्यता है कि भगवान गणेश को मोदक प्रिय है।

आरती के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

धार्मिक परंपरा के अनुसार आरती में घी या तिल के तेल का दीपक और रूई की बाती इस्तेमाल की जाती है। आरती की थाली को निर्धारित क्रम में घुमाने, घंटी बजाने और दोनों हाथों से ताली बजाने की परंपरा है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में आरती की विधि अलग हो सकती है।

धार्मिक मान्यताएं आस्था और परंपरा पर आधारित हैं। पूजा की विधि और मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित की सलाह लेना बेहतर रहेगा।