नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026 : देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की योजना पर एकबार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि संसद की संयुक्त संसदीय समिति इस प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है। समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद पीपी चौधरी के मुताबिक यदि संबंधित विधेयक 2028 तक संसद से पारित हो जाता है और जरूरी सहमति बनती है तो 2029 में कुछ राज्यों में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। हालांकि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने इस योजना की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए हैं। उनका साफ कहना है कि इतनी बड़ी चुनावी प्रक्रिया के लिए छह महीने पर्याप्त नहीं होंगे और सामान्य परिस्थितियों में दो से तीन साल की तैयारी की जरूरत पड़ सकती है।
2029 में एक साथ चुनाव कराने की क्या है तैयारी ?
पीपी चौधरी के अनुसार, वन नेशन-वन इलेक्शन से जुड़ी संयुक्त संसदीय समिति की अब तक 25 बैठकें हो चुकी हैं। समिति विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जाकर राजनीतिक दलों, सरकारी अधिकारियों, कारोबारियों, मीडिया प्रतिनिधियों और नागरिक संगठनों से राय ले रही है। समिति के सामने मुख्य सवाल यह है कि अलग-अलग समय पर समाप्त होने वाले विधानसभा कार्यकालों को एक चुनावी चक्र में कैसे लाया जाए। इसके लिए संवैधानिक प्रावधानों, राजनीतिक सहमति और चुनावी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जा रहा है। पीपी चौधरी का कहना है कि यदि जरूरी विधायी प्रक्रिया पूरी हो जाती है और संबंधित राज्य सहमत होते हैं, तो 2029 में एक साथ चुनाव कराने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। हालांकि यह अभी एक प्रस्तावित संभावना है, अंतिम फैसला नहीं।
सहमत राज्यों में 2029, बाकी राज्यों के लिए 2034 का विकल्प
पीपी चौधरी के मुताबिक, समिति अलग-अलग राज्यों की सहमति और असहमति का आकलन कर रही है। उनके अनुसार, जो राज्य प्रस्ताव से सहमत होंगे, वहां विधानसभा चुनावों को 2029 के चुनावी चक्र के साथ लाने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। बाकी राज्यों को बाद के चुनावी चक्र में शामिल करने का विकल्प भी चर्चा में है। रिपोर्ट में बीजेपी या एनडीए की सरकार वाले 22 राज्यों को लेकर सहमति की संभावना का जिक्र किया गया है। हालांकि, राज्यों की अंतिम सहमति और प्रस्ताव लागू करने की प्रक्रिया की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
एक साथ चुनाव से सात लाख करोड़ रुपये बचने का दावा
वन नेशन-वन इलेक्शन के समर्थन में सबसे प्रमुख तर्क चुनावों पर होने वाले खर्च में कमी का है। पीपी चौधरी के मुताबिक रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति से जुड़े आर्थिक आकलन में दावा किया गया था कि एक साथ चुनाव कराने से अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ हो सकता है। इस रिपोर्ट में लगभग सात लाख करोड़ रुपये के आर्थिक लाभ और जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि का दावा किया गया है। समर्थकों का तर्क है कि बार-बार चुनाव कराने में लगने वाले प्रशासनिक, सुरक्षा व लॉजिस्टिक संसाधनों की बचत हो सकती है। हालांकि इस अनुमान को वास्तविक बचत मानने से पहले इसके आधार, समयावधि और गणना की पद्धति को समझना जरूरी है। प्रस्ताव लागू होने पर वास्तविक बचत कितनी होगी, यह चुनावी व्यवस्था और उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने क्यों उठाए सवाल ?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने छह महीने में तैयारी पूरी होने के दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों को एक साथ कराने के लिए बड़ी संख्या में ईवीएम और अन्य संसाधनों की जरूरत होगी। कुरैशी के अनुसार, चुनावी मशीनों की उपलब्धता, कर्मचारियों की तैनाती, सुरक्षा व्यवस्था और लॉजिस्टिक्स की तैयारी में काफी समय लग सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि सामान्य परिस्थितियों में छह महीने की अवधि पर्याप्त नहीं होगी। इस तरह, जहां समिति के अध्यक्ष 2029 में शुरुआत की संभावना जता रहे हैं, वहीं पूर्व चुनाव आयुक्त ने तैयारी के समय और संसाधनों को लेकर व्यावहारिक चुनौतियां सामने रखी हैं।
वन नेशन-वन इलेक्शन के पक्ष में क्या हैं दलीलें ?
इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने से बार-बार चुनावी आचार संहिता लागू होने की समस्या कम हो सकती है। इससे सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों में आने वाली संभावित रुकावटें घटने की उम्मीद है। इसके अलावा, शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाने की जरूरत कम हो सकती है। स्कूलों में पढ़ाई का कार्यक्रम प्रभावित होने और चुनावी प्रबंधन पर बार-बार खर्च होने की समस्या कम होने का दावा किया जाता है। समर्थकों के अनुसार प्रवासी मजदूरों को बार-बार मतदान के लिए अपने गृह क्षेत्र की यात्रा करने की जरूरत भी कम पड़ सकती है। हालांकि, इन लाभों की वास्तविक सीमा चुनावी कार्यक्रम और लागू किए जाने वाले नियमों पर निर्भर करेगी।
विपक्ष ने संघीय व्यवस्था और लोकतंत्र पर जताई चिंता
वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर विपक्षी दलों ने संवैधानिक और राजनीतिक सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने इसे संघीय व्यवस्था और लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह बताया है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के रुख को लेकर प्रकाशित रिपोर्ट में उनके करीबी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि वह इस प्रस्ताव के विरोध में हैं। दूसरी ओर, समिति के अध्यक्ष का कहना है कि सभी राजनीतिक दलों और संबंधित पक्षों के विचार सुनने के बाद ही समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। विरोध करने वाले पक्षों की प्रमुख चिंता यह है कि अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां और सरकारों के कार्यकाल अलग होते हैं। ऐसे में सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए संवैधानिक संशोधनों और संघीय ढांचे पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत आकलन जरूरी होगा।
सरकार गिरने पर क्या होगा ?
समिति के सामने एक अहम सवाल यह है कि यदि एक साथ चुनाव कराने के बाद किसी राज्य की सरकार बीच में गिर जाती है तो आगे क्या व्यवस्था होगी। इसमें अविश्वास प्रस्ताव, समय से पहले विधानसभा भंग होने और बाकी कार्यकाल पूरा करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। जर्मनी के कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ नो कॉन्फिडेंस मॉडल का उदाहरण भी चर्चा में आया है, जिसमें सरकार बदलने के दौरान नए नेतृत्व के चयन की व्यवस्था है। हालांकि भारत में ऐसा कोई मॉडल अपनाने के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों की स्पष्टता आवश्यक होगी।
क्या 2029 में लागू हो पाएगा वन नेशन-वन इलेक्शन ?
फिलहाल 2029 में एक साथ चुनाव कराने की संभावना विधायी प्रक्रिया, राजनीतिक सहमति, चुनाव आयोग की तैयारियों और संवैधानिक सवालों पर निर्भर है। संयुक्त संसदीय समिति की चर्चा और विभिन्न राज्यों से ली जा रही राय इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं। पीपी चौधरी इसे संभव मानते हैं, जबकि एसवाई कुरैशी ने कम समय में तैयारी पूरी करने पर संदेह जताया है। ऐसे में वन नेशन-वन इलेक्शन को 2029 में लागू करने का प्रस्ताव अभी अंतिम निर्णय नहीं है। इसकी वास्तविक स्थिति विधेयक, संसदीय प्रक्रिया और आधिकारिक निर्णयों से स्पष्ट होगी।




