नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल पुराने गंभीर चोट पहुंचाने के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने लंबे समय तक मुकदमा चलने का हवाला देते हुए दो दोषियों को प्रोबेशन पर रिहा कर दिया था। अब शीर्ष अदालत ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे ‘गलत सहानुभूति’ का मामला बताया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दोनों दोषियों को सरेंडर करने का निर्देश दिया है और हाईकोर्ट से मामले की दोबारा सुनवाई करने को कहा है।
पांच साल की सजा के बावजूद जेल नहीं गए दोषी
मामला वर्ष 2003 का है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को गंभीर चोट पहुंचाने के लिए पांच-पांच साल की जेल की सजा सुनाई थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुकदमे की लंबी अवधि को ध्यान में रखते हुए उन्हें प्रोबेशन पर रिहा कर दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़ित के भाई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दोषियों को बिना जेल की सजा काटे राहत कैसे दी जा सकती है।
‘गलत सहानुभूति’ दिखाने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इस मामले में अदालतों ने पीड़ित की स्थिति और उसे हुई गंभीर चोटों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, पीड़ित के दोनों हाथों की कार्यक्षमता काफी हद तक प्रभावित हुई है और उसे इलाज की जरूरत बनी हुई है। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि पीड़ित को हुए नुकसान के मुकाबले दोषियों को दी गई राहत कितनी उचित थी। शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ित के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
लंबे ट्रायल के आधार पर राहत देने पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मुकदमे का लंबे समय तक चलना किसी भी पक्ष के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। हालांकि, अदालत ने कहा कि केवल ट्रायल में देरी को आधार बनाकर गंभीर अपराध में दोषी ठहराए गए लोगों को राहत देना उचित नहीं है। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि दोषी जमानत पर रहते हुए अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे थे और उनके चरित्र को लेकर भी प्रतिकूल रिपोर्ट थी। ऐसे में उन्हें प्रोबेशन का लाभ देने के फैसले पर अदालत ने गंभीर सवाल उठाए।
दोषियों को सरेंडर करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों दोषियों को सरेंडर करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट को मामले की फिर से दोबारा सुनवाई करने के लिए कहा गया है। यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि सजा तय करते समय केवल मुकदमे की अवधि ही नहीं, बल्कि अपराध की गंभीरता, पीड़ित को पहुंचे नुकसान और न्याय के व्यापक उद्देश्य को भी ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।




