नई दिल्ली | 11 जुलाई 2026
भारतीय राजनीति में कई ऐसे मौके आए हैं, जब राजनीतिक परिस्थितियों और संगठनात्मक मजबूरियों के चलते दलों को ऐसे नेताओं को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा, जिन्हें बाद में हटाने का फैसला पार्टी के लिए ही चुनौती बन गया। बिहार, झारखंड और पंजाब की राजनीति में जीतन राम मांझी, चंपाई सोरेन और चरणजीत सिंह चन्नी ऐसे ही तीन प्रमुख नाम हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा समय-समय पर चर्चा का विषय बनी।
बिहार में मांझी की बगावत ने बदले समीकरण
साल 2014 में लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और जनता दल (यूनाइटेड) ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि कुछ ही महीनों बाद पद छोड़ने की नौबत आने पर मांझी ने अलग राह चुनी और अपनी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा का गठन कर लिया। इसके बाद बिहार की राजनीति में नए समीकरण बने।
झारखंड में चंपाई सोरेन ने बदला राजनीतिक रास्ता
साल 2024 में हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया गया था। हेमंत सोरेन की वापसी के बाद मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद वे लगातार राज्य सरकार और अपने पूर्व दल की नीतियों पर सवाल उठाते रहे।
पंजाब में चन्नी को लेकर बढ़ी राजनीतिक चर्चा
पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी को वर्ष 2021 में कांग्रेस ने राज्य का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया था। अब आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उनके संभावित नेतृत्व की भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। हालांकि पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
उम्मीदवार नहीं, नेतृत्व भी बनता है चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री पद पर किसी नेता की नियुक्ति केवल सत्ता संचालन का निर्णय नहीं होती, बल्कि उसका असर संगठन, चुनावी रणनीति और भविष्य की राजनीति पर भी पड़ता है। बिहार, झारखंड और पंजाब के ये उदाहरण बताते हैं कि नेतृत्व परिवर्तन कई बार दलों के लिए नई राजनीतिक चुनौतियां भी खड़ी कर देता है।




