नई दिल्ली, 26 अक्टूबर 2026 : भारत के अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर बांध बनाने का जमकर विरोध हो रहा है। हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर सियांग अपर बहुउद्देशीय प्रोजेक्ट (SUMP) का कड़ा विरोध किया है। इस प्रोजेक्ट से स्थानीय लोगों को विस्थापन, पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान और अपनी पुश्तैनी जमीन छिनने का डर है। भारत के इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को तिब्बत में ब्रह्मापुत्र नदी पर बनाए जा रहे मेगा डैम का रणनीतिक जवाब माना जा रहा है। इस बीच चीन के शोधकर्ताओं ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जा रहे मेगा डैम को लेकर एक बड़ी चेतावनी जारी की है। उन्होंने बताया कि यह डैम बदलते मौसम और ग्लोबल वार्मिंग के कारण खतरनाक हो सकता है।

चीन के मेगा डैम पर वैज्ञानिकों की चेतावनी क्या है ?

रिपोर्ट के मुताबिक चीनी विज्ञान अकादमी और युन्नान विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पेड़ों के वार्षिक छल्लों से मिले आंकड़ों की मदद से वर्ष 1325 से 2020 तक नदी के बहाव का ऐतिहासिक रिकॉर्ड तैयार किया। इसके बाद जलवायु संबंधी आंकड़ों के साथ मॉडलिंग कर भविष्य के संभावित बदलावों का अनुमान लगाया गया। 8 अक्टूबर को China Science Bulletin में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में सालाना रन-ऑफ 20 प्रतिशत और अधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 29 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। रन-ऑफ से आशय बारिश, बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने से प्राप्त उस पानी से है, जो नदी में पहुंचता है। शोधकर्ताओं ने अत्यधिक जलप्रवाह वाली घटनाओं की संभावना बढ़ने की ओर भी संकेत किया है।

भारत के लिए क्यों अहम है ब्रह्मपुत्र?

तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से बहने वाली यह नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग कहलाती है और आगे असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से बहती है। इसलिए नदी के बहाव में बड़े बदलावों का आकलन भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। चीन के मेगा प्रोजेक्ट के संदर्भ में भारत की चिंताएं केवल बाढ़ तक सीमित नहीं हैं। नदी के पानी के प्रवाह, जल-संसाधनों के प्रबंधन और सीमा पार जल संबंधी जानकारी की उपलब्धता जैसे मुद्दे भी रणनीतिक महत्व रखते हैं। हालांकि, इस अध्ययन से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि चीन का बांध निश्चित रूप से भारत में बाढ़ पैदा करेगा।

चीन का 60,000 मेगावाट का विशाल प्रोजेक्ट

चीन दक्षिण-पूर्वी तिब्बत के मेडोग क्षेत्र में यारलुंग त्सांगपो नदी पर लगभग 60,000 मेगावाट क्षमता वाली विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित कर रहा है। इसकी अनुमानित लागत करीब 168 अरब अमेरिकी डॉलर बताई गई है। पूरी क्षमता पर यह दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल होगी। इतने बड़े प्रोजेक्ट को लेकर नदी के प्राकृतिक प्रवाह, पर्यावरण और आपदा जोखिमों पर निगरानी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन परियोजना के वास्तविक प्रभावों का आकलन करने के लिए तकनीकी जानकारी, संचालन संबंधी विवरण और स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन भी जरूरी होंगे।

अरुणाचल प्रदेश में सियांग प्रोजेक्ट का विरोध क्यों ?

भारत की प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना को चीन के मेगा डैम के संदर्भ में रणनीतिक महत्व वाला प्रोजेक्ट माना जा रहा है। सरकार के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों में बिजली उत्पादन, बाढ़ प्रबंधन और जल-सुरक्षा शामिल हैं। दूसरी ओर, सियांग घाटी के स्थानीय समुदायों को पुश्तैनी जमीन, गांवों के संभावित विस्थापन, आजीविका और पर्यावरण पर असर की चिंता है। अक्टूबर 2026 में विरोध प्रदर्शनों के दौरान तनाव भी बढ़ा। स्थानीय लोगों की मांग है कि परियोजना से जुड़े सर्वेक्षण और आगे की प्रक्रिया में उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए। इस तरह भारत के सामने दोहरी चुनौती है- एक तरफ नदी और जल-सुरक्षा से जुड़े रणनीतिक पहलुओं का आकलन तो ओर स्थानीय समुदायों के अधिकारों और पर्यावरणीय प्रभावों का समाधान।

आगे क्या ?

ब्रह्मपुत्र बेसिन में जलवायु परिवर्तन और बड़े बांधों के संभावित प्रभावों को समझने के लिए वैज्ञानिक निगरानी, पारदर्शी आंकड़े और भारत-चीन के बीच जल संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान अहम हो सकता है। इसके साथ ही सियांग परियोजना पर निर्णय लेते समय पर्यावरणीय आकलन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। चीन के मेगा डैम से जुड़ी नई रिसर्च ब्रह्मपुत्र के भविष्य के जलप्रवाह और बाढ़ जोखिमों पर ध्यान देने की जरूरत बताती है।