पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने अपने हालिया फेसबुक पोस्ट में उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन क्षेत्र स्थित शेरगढ़ गांव के प्रवास को एक अत्यंत आत्मिक और अविस्मरणीय अनुभव बताया है। उन्होंने लिखा कि उन्हें सैकड़ों वर्षों पुराने विशाल वटवृक्ष की छांव में बैठकर प्रकृति के सान्निध्य में आत्मचिंतन और साधना का अवसर मिला, जहां उन्हें गहन शांति और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त हुई।
उन्होंने ब्रजभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते हुए कहा कि चारों ओर फैली हरियाली, मंद हवा और मोरों का नृत्य मन को आनंद और सुकून से भर देता है। उनके अनुसार, यह क्षेत्र आज भी भारतीय ग्राम्य जीवन, संस्कृति और परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।
अश्विनी चौबे ने गांव की महिलाओं की रचनात्मकता की विशेष प्रशंसा की, जिन्होंने गोयठा रखने के लिए बनाए गए बिटोरों पर सुंदर कलाकृतियां उकेरकर लोक कला और ग्रामीण सृजनशीलता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे भारतीय लोक संस्कृति की समृद्ध परंपरा का प्रतीक बताया।
अपने प्रवास के दौरान उन्हें ग्रामीण मातृशक्ति द्वारा पारंपरिक भोजन—चूल्हे पर बनी रोटी और कढ़ी—से सम्मानित किया गया, जिसे उन्होंने केवल भोजन नहीं बल्कि प्रेम, अपनापन और भारतीय आतिथ्य संस्कृति का प्रतीक बताया।
उन्होंने गौ माता को रोटी खिलाकर आशीर्वाद प्राप्त करने का अनुभव भी साझा किया और कहा कि यह यात्रा केवल एक भ्रमण नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, ग्राम्य जीवन और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव था।
अंत में उन्होंने कहा कि ब्रजभूमि की यह स्मृतियां उनके जीवन में सदैव संजोकर रखने योग्य हैं, जो उन्हें भारतीय संस्कृति की जड़ों से और अधिक गहराई से जोड़ती हैं।




