पटना, 19 अगस्त 2026 : राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कार्यकारी अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के लोकभवन मार्च को लेकर बिहार की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। सिवान फायरिंग, पेपर लीक और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर आयोजित इस मार्च में महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी दलों की सक्रिय भागीदारी साफ तौर पर नहीं दिखी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या राजद अब महागठबंधन से अलग अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है ? राजनीतिक गलियारों में RJD के इस कदम को ‘एकला चलो’ की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि कांग्रेस ने मार्च को नैतिक समर्थन देने की बात कही है।
विपक्ष की भूमिका मजबूत करने की कोशिश ?
तेजस्वी यादव के लोकभवन मार्च को सिर्फ विरोध प्रदर्शन के तौर पर नहीं, बल्कि विपक्ष में RJD की भूमिका मजबूत करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। सिवान फायरिंग मामले में पुलिस की कार्रवाई के बाद भी RJD ने सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने का फैसला किया। पार्टी के मुताबिक कानून-व्यवस्था, पेपर लीक और अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरना जरूरी है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषण में यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर मुद्दा सरकार के खिलाफ विपक्षी संघर्ष का है, तो महागठबंधन के सभी दलों को एक मंच पर क्यों नहीं लाया गया।
कांग्रेस ने दिया नैतिक समर्थन
लोकभवन मार्च में कांग्रेस की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं रही। हालांकि, कांग्रेस ने RJD के आंदोलन को नैतिक समर्थन देने की बात कही। कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने कहा कि यह RJD का अपना कार्यक्रम है और कांग्रेस इसमें शामिल नहीं है, लेकिन पार्टी इसका नैतिक समर्थन करती है। उन्होंने यह भी माना कि अगर पूरे महागठबंधन की भागीदारी होती तो मार्च ज्यादा मजबूत होता और जनता के बीच बेहतर संदेश जाता। इस बयान से साफ है कि कांग्रेस RJD के आंदोलन का विरोध नहीं कर रही, लेकिन साझा विपक्षी मंच की कमी को लेकर उसकी अपनी राय जरूर है।
क्या RJD को ‘एकला चलो’ की जरूरत महसूस हुई ?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि RJD हाल के कुछ मुद्दों पर विपक्षी राजनीति में पिछड़ने की धारणा को बदलना चाहता है। पेपर लीक, पुलिस फायरिंग और अन्य घटनाओं को लेकर विपक्षी दलों की सक्रियता अलग-अलग रही है। ऐसे में तेजस्वी यादव का सड़क पर उतरना RJD की राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है। विशेष रूप से बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे के बाद RJD के सामने विपक्ष की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत रखने की चुनौती बढ़ी है।
महागठबंधन में पहले भी दिखी है अलग-अलग रणनीति
बिहार की राजनीति में महागठबंधन के दलों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर अलग रणनीति देखने को मिलती रही है। हालांकि विधानसभा चुनाव के दौरान भी कई सीटों पर सहयोगी दलों के बीच दोस्ताना मुकाबले की स्थिति बनी थी। बांकीपुर उपचुनाव में भी महागठबंधन के घटक दलों के बीच पूरी तरह एकजुट रणनीति नहीं दिखी। अब लोकभवन मार्च में भी RJD के अकेले उतरने से गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं। इसमें अन्य दलों की उपस्थिति नहीं नहीं दिखी है।
अलग-अलग राजनीतिक ‘पिच’ पर बल्लेबाजी ?
RJD के अकेले लोकभवन मार्च को राजनीतिक विश्लेषक महागठबंधन के दलों की अलग-अलग राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं। एक तरफ RJD तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सड़क पर उतरकर सरकार को घेरना चाहता है, वहीं कांग्रेस और दूसरे सहयोगी दल अपने-अपने राजनीतिक मुद्दों और रणनीति के हिसाब से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक आंदोलन तक सीमित रणनीति है या फिर बिहार में महागठबंधन के भीतर राजनीतिक दूरी बढ़ने के संकेत हैं?
आगे क्या होगा ?
तेजस्वी यादव का यह मार्च RJD के लिए कितना राजनीतिक फायदा लेकर आता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। अगर पार्टी इस आंदोलन के जरिए जनता के बीच अपनी भूमिका मजबूत करने में सफल होती है, तो ‘एकला चलो’ की रणनीति को मजबूती मिल सकती है। लेकिन अगर महागठबंधन के सहयोगी दलों के बीच समन्वय की कमी लगातार बनी रही, तो इसका असर विपक्षी एकजुटता पर पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि तेजस्वी यादव के लोकभवन मार्च ने बिहार की सियासत में महागठबंधन की एकजुटता और RJD की रणनीति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।




