पटना, 22 अक्टूबर 2026 : बिहार में वर्ष 2016 में शराबबंदी लागू होने के एक दशक बाद नशीले पदार्थों की तस्करी और उनके दुरुपयोग को लेकर चिंता बढ़ रही है। पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में NDPS एक्ट के तहत दर्ज मामलों और कई तरह के नशीले पदार्थों की जब्ती में तेज बढ़ोतरी हुई है। हेरोइन, नशीली गोलियां, इंजेक्शन और स्थानीय स्तर पर ‘कोटा’ कहे जाने वाले पदार्थ को लेकर जांच एजेंसियां सतर्क हैं। रिपोर्टों के अनुसार बिहार में 2019 में NDPS एक्ट के तहत 697 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2026 के शुरुआती पांच महीनों में यह संख्या 1,905 तक पहुंच गई। हालांकि दर्ज मामलों और जब्ती में वृद्धि से नशे के वास्तविक इस्तेमाल में हुई बढ़ोतरी का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्वास्थ्य, सर्वेक्षण और अन्य आंकड़ों को भी देखना जरूरी है।

क्या है ‘कोटा’, क्यों बढ़ी चिंता?

रिपोर्टों के अनुसार, बिहार में ‘कोटा’ नाम से पहचाने जाने वाले नशीले पदार्थ की तस्करी भी सामने आई है। इसे कच्ची हेरोइन के एक रूप के तौर पर बताया गया है। नशीले पदार्थों की आपूर्ति के नेटवर्क में पूर्वोत्तर भारत और म्यांमार से जुड़े रास्तों का उल्लेख किया गया है। तस्करी के मामलों में छोटी पैकिंग और छिपाकर ले जाने के तरीकों से पुलिस के सामने चुनौती बढ़ती है।

NDPS मामलों और जब्ती के आंकड़ों में बढ़ोतरी

बिहार पुलिस के आंकड़ों पर आधारित मीडिया रिपोर्टों में कई नशीले पदार्थों की जब्ती में तेज वृद्धि दर्ज की गई है।

  • NDPS मामले : 2019 में 697 मामलों के मुकाबले 2026 के पहले पांच महीनों में 1,905 मामले दर्ज किए गए।
  • नशीले इंजेक्शन : 2022 में 3,677 इंजेक्शन जब्त हुए थे, जबकि 2026 के पहले पांच महीनों में यह संख्या 3,83,066 बताई गई।
  • नशीली गोलियां : 2022 में 29,762 गोलियां जब्त की गई थीं। 2026 के शुरुआती पांच महीनों में यह आंकड़ा 9.29 लाख बताया गया।
  • किशोरों से जुड़े मामले : रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2023 के बीच NDPS कानून के तहत 11 किशोर हिरासत में लिए गए थे, जबकि 2024 में यह संख्या 50 रही।

ये आंकड़े जब्ती और कानूनी कार्रवाई को दर्शाते हैं। इन्हें नशे के आदी लोगों की कुल संख्या या राज्य में नशे के वास्तविक प्रसार का सीधा माप नहीं माना जाना चाहिए।

शराबबंदी के बाद नशे के बाजार में बदलाव ?

रिपोर्टों में दावा किया गया है कि शराब की अवैध बिक्री और ऊंची कीमतों के बीच कुछ लोग दूसरे नशीले पदार्थों की ओर आकर्षित हुए। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान दूसरे राज्यों से लौटे प्रवासी मजदूरों के जरिए भी कुछ नेटवर्क ग्रामीण इलाकों तक पहुंचने की बात सामने आई है। हालांकि, शराबबंदी और ड्रग्स के इस्तेमाल के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित करने के लिए व्यापक अध्ययन जरूरी है। नशे के बाजार में बदलाव के पीछे तस्करी के नेटवर्क, उपलब्धता, कीमत, सामाजिक परिस्थितियां और नशे की मांग जैसे कई कारक हो सकते हैं।

पटना समेत कई इलाकों में पुलिस की चुनौती

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पटना में भी नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। गोलियों, इंजेक्शन और अन्य दवाओं का गलत इस्तेमाल पुलिस के साथ-साथ स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी चुनौती है। नशीले पदार्थों की निर्भरता से जूझ रहे लोगों को केवल कानूनी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि समय पर चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक सहायता और पुनर्वास की जरूरत भी होती है। खासकर किशोरों और युवाओं के मामले में परिवार, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

सरकार और पुलिस की रणनीति

नशीले पदार्थों की तस्करी पर रोक लगाने के लिए बिहार में मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो और पुलिस की विशेष नारकोटिक्स इकाइयों के जरिए कार्रवाई की जा रही है। रिपोर्टों में बिहार पुलिस की STF नारकोटिक्स सेल द्वारा बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ जब्त करने और आरोपियों की गिरफ्तारी का भी उल्लेख है। विशेषज्ञों और अधिकारियों के सामने चुनौती केवल तस्करी रोकने की नहीं, बल्कि नशे की मांग कम करने, युवाओं को जागरूक बनाने और इलाज व पुनर्वास की सुविधाएं मजबूत करने की भी है। बिहार में शराबबंदी के दस साल बाद नशीले पदार्थों से जुड़ी यह चुनौती कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य- दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। प्रभावी कार्रवाई के साथ विश्वसनीय आंकड़ों, रोकथाम और नशामुक्ति सेवाओं पर ध्यान देना भी जरूरी होगा।