नई दिल्ली | 15 जुलाई 2026
पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई करते समय न्यायाधीशों को केवल उपलब्ध साक्ष्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और निर्धारित दिशा-निर्देशों का भी गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
पटना हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारने का प्रयास करना और उसकी छाती दबाना, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हर स्थिति में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने इसे महिला की मर्यादा भंग करने से जुड़ा अपराध माना और आरोपी को आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी ठहराया, जबकि रेप की कोशिश के आरोप से राहत दी।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रासंगिक फैसलों और कानूनी दिशा-निर्देशों का अध्ययन करें। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि "जजों को भी रिसर्च करनी चाहिए।" अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) की तैयार हैंडबुक और समिति की रिपोर्ट सभी हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से शुरू हुआ विवाद
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक टिप्पणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। उस फैसले में कहा गया था कि किसी लड़की के कपड़े खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना अपने आप में रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी पर देशभर में विवाद हुआ था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़े व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने की प्रक्रिया शुरू की।
2008 के मामले में बदला गया फैसला
पटना हाईकोर्ट का यह मामला वर्ष 2008 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक फोटोग्राफी स्टूडियो में आरोपी ने युवती को कमरे में बंद कर उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप की कोशिश का दोषी माना था, लेकिन हाईकोर्ट ने मेडिकल और अन्य साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए रेप की कोशिश की धारा हटाकर महिला की मर्यादा भंग करने के अपराध के तहत सजा बरकरार रखी।




