बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक और हस्तशिल्प परंपरा को एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। राज्य के तीन विशिष्ट पारंपरिक उत्पादों—नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गया का पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पारंपरिक पिढ़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह सम्मान इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान, गुणवत्ता और क्षेत्रीय विरासत को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
बावन बूटी साड़ी अपनी अनोखी बुनाई और पारंपरिक डिजाइन के लिए जानी जाती है, जबकि पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट गया जिले की प्राचीन शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। वहीं भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग लोक संस्कृति और पारंपरिक कला का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। GI टैग मिलने से इन उत्पादों की मौलिकता सुरक्षित होगी और इनके नाम का उपयोग केवल संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित उत्पादकों द्वारा ही किया जा सकेगा। इससे स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों को आर्थिक लाभ मिलने की संभावना भी बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग से इन उत्पादों की बाजार में मांग बढ़ेगी और बिहार की कला एवं संस्कृति को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी। साथ ही यह राज्य के हस्तशिल्प उद्योग, पर्यटन और स्थानीय रोजगार को भी प्रोत्साहन देगा। बिहार की यह उपलब्धि न केवल उसकी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है, बल्कि पारंपरिक कौशल और शिल्प को संरक्षित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।




