बांका | 30 जुलाई 2026
बिहार के महत्वाकांक्षी रक्सौल-हल्दिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे परियोजना को लेकर बांका जिले में प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। करीब 600 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे का लगभग 75 किलोमीटर हिस्सा बांका जिले से होकर गुजरेगा। इसके लिए जिले के पांच प्रखंडों के 58 गांवों की जमीन अधिग्रहित की जानी है। प्रशासन ने पहले चरण में 29 गांवों में जमीन सत्यापन और दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है।
पहले चरण में 29 गांवों का सत्यापन शुरू
जिला भू-अर्जन कार्यालय के अनुसार, शंभूगंज, अमरपुर और बांका प्रखंड के 29 गांवों की थ्री-ए अधिसूचना प्राप्त होने के बाद अधिकारियों ने खाता-खेसरा, भूमि क्षेत्रफल और स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन शुरू कर दिया है।
प्रशासन का कहना है कि दस्तावेजों की जांच पूरी होने के बाद आपत्तियों का निपटारा किया जाएगा और प्रभावित भूमि मालिकों के लिए मुआवजे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
बाकी 29 गांवों की रिपोर्ट का इंतजार
परियोजना में शामिल फुल्लीडुमर और कटोरिया प्रखंड के 29 राजस्व गांवों की थ्री-ए रिपोर्ट अभी प्राप्त नहीं हुई है। अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट मिलते ही इन गांवों में भी भूमि अधिग्रहण और सत्यापन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
ऐसा होगा बांका जिले में एक्सप्रेसवे का रूट
प्रस्तावित एक्सप्रेसवे शंभूगंज से बांका जिले में प्रवेश करेगा और फुल्लीडुमर, अमरपुर तथा बांका प्रखंड से होते हुए कटोरिया पहुंचेगा। इसके बाद यह मार्ग झारखंड के देवघर क्षेत्र से गुजरते हुए पश्चिम बंगाल के हल्दिया बंदरगाह तक जाएगा।
यह कॉरिडोर बिहार के सीमावर्ती और पिछड़े क्षेत्रों को राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क तथा प्रमुख औद्योगिक केंद्रों से जोड़ने में अहम भूमिका निभाएगा।
रोजगार और कारोबार को मिलेगा बढ़ावा
परियोजना के निर्माण के दौरान स्थानीय स्तर पर हजारों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। सड़क निर्माण, मशीनरी संचालन, परिवहन और लॉजिस्टिक्स से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा। वहीं एक्सप्रेसवे बनने के बाद इसके किनारे पेट्रोल पंप, होटल, ढाबे, ट्रांसपोर्ट हब और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।
बिहार में सबसे लंबा हिस्सा
करीब 600 किलोमीटर लंबे रक्सौल-हल्दिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का सबसे बड़ा हिस्सा बिहार में होगा। राज्य में इसकी लंबाई लगभग 406 किलोमीटर रहेगी, जबकि झारखंड में करीब 90 किलोमीटर और पश्चिम बंगाल में लगभग 90 से 100 किलोमीटर तक यह मार्ग विकसित किया जाएगा। अकेले बांका जिले में 75 किलोमीटर लंबे हिस्से के लिए 58 गांवों की जमीन अधिग्रहित की जाएगी।




