पटना | 11 जुलाई 2026

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में खुद चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन अब उन्होंने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के जरिए सीधे चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल एक सीट जीतने का प्रयास नहीं, बल्कि एक सुनियोजित चुनावी रणनीति का हिस्सा है। प्रशांत किशोर की नजर उन मतदाताओं पर है, जो पिछले चुनाव में मतदान करने नहीं पहुंचे थे और जो पारंपरिक रूप से न तो भाजपा और न ही राजद के स्थायी वोटर माने जाते हैं।

60 प्रतिशत वोटरों पर फोकस

2025 के विधानसभा चुनाव में बांकीपुर सीट पर कुल मतदान लगभग 41.35 प्रतिशत हुआ था। भाजपा उम्मीदवार नितिन नवीन को 98,299 वोट (करीब 62%) मिले, जबकि राजद की रेखा कुमारी को 46,363 वोट (करीब 29.55%) प्राप्त हुए। इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया। अनुमान के मुताबिक करीब 1.75 लाख मतदाता मतदान से दूर रहे। जन सुराज की रणनीति इन्हीं गैर-मतदान करने वाले वोटरों को मतदान केंद्र तक लाने की बताई जा रही है।

स्थानीय मुद्दों के जरिए साधने की कोशिश

प्रशांत किशोर अपने चुनाव प्रचार में नीट छात्रा की कथित हत्या, पेपर लीक प्रकरण और भरत तिवारी एनकाउंटर जैसे स्थानीय और संवेदनशील मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन मुद्दों के जरिए वे सरकार को घेरने के साथ-साथ नाराज मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं।

सवर्ण और मुस्लिम वोट बैंक पर भी नजर

बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत समुदाय का प्रभाव माना जाता है। इन तीनों वर्गों के मतदाताओं की संख्या मिलाकर लगभग 19 प्रतिशत यानी करीब 63 हजार वोट बताई जाती है। इसके अलावा क्षेत्र में लगभग 10 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता भी हैं। जन सुराज इन दोनों वर्गों तक अलग-अलग राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रही है। पार्टी राजनीतिक भागीदारी, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता देकर समर्थन जुटाने का प्रयास कर रही है।

भाजपा के लिए आसान नहीं होगी चुनौती

हालांकि बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। यहां पार्टी का मजबूत संगठन और बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क मौजूद है। ऐसे में प्रशांत किशोर की रणनीति कितनी सफल होती है, इसका फैसला उपचुनाव के नतीजे ही करेंगे। फिलहाल बांकीपुर की लड़ाई केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक दिशा और जन सुराज की चुनावी ताकत की भी बड़ी परीक्षा मानी जा रही है।