नई दिल्ली | 8 जुलाई 2026

देशभर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल के विस्तार के बीच ट्रांसपोर्ट उद्योग ने इसके संभावित तकनीकी और आर्थिक प्रभावों को लेकर केंद्र सरकार से कई अहम सवाल उठाए हैं। ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का कहना है कि यदि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों का माइलेज घटता है, इंजन प्रभावित होता है या रखरखाव का खर्च बढ़ता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, इस पर सरकार को स्पष्ट नीति घोषित करनी चाहिए।

छोटे ट्रांसपोर्टरों पर बढ़ सकता है आर्थिक बोझ

एसोसिएशन का कहना है कि देश के लाखों छोटे और मध्यम ट्रांसपोर्टर बैंक ऋण लेकर ट्रक और अन्य वाणिज्यिक वाहन चलाते हैं। यदि नए ईंधन के कारण परिचालन लागत बढ़ती है, तो इसका सीधा असर उनके व्यवसाय और आय पर पड़ेगा। संगठन ने आशंका जताई कि अतिरिक्त खर्च का बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।

माइलेज और पुराने वाहनों पर उठे सवाल

ट्रांसपोर्ट संगठनों का दावा है कि कुछ अध्ययनों में E20 ईंधन के उपयोग से 2 से 6 प्रतिशत तक माइलेज घटने की संभावना बताई गई है। साथ ही, पुराने कमर्शियल वाहनों में फ्यूल पाइप, रबर सील, गैस्केट और फ्यूल सिस्टम के अन्य हिस्सों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका भी जताई गई है। संगठन ने पूछा है कि यदि भविष्य में तकनीकी खराबियां सामने आती हैं, तो वाहन निर्माता, तेल कंपनियां या सरकार—जिम्मेदारी किसकी होगी?

विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग

एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि IIT, वैज्ञानिक संस्थानों, ऑटोमोबाइल कंपनियों, तेल कंपनियों और ट्रांसपोर्ट संगठनों के विशेषज्ञों को शामिल कर एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जाए। यह समिति भारतीय परिस्थितियों में E20 ईंधन के प्रभावों का स्वतंत्र अध्ययन करे और अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करे।

क्षतिपूर्ति नीति और स्पष्ट जवाबदेही की मांग

एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र कपूर ने कहा कि यह केवल ईंधन परिवर्तन का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों वाहन मालिकों, लाखों ट्रांसपोर्ट कारोबारियों और देश की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा विषय है। उन्होंने मांग की कि यदि E20 ईंधन के कारण किसी वाहन को तकनीकी या आर्थिक नुकसान होता है, तो प्रभावित वाहन मालिकों के लिए पारदर्शी क्षतिपूर्ति व्यवस्था और स्पष्ट जवाबदेही तय की जानी चाहिए। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके साथ आर्थिक सुरक्षा और वैज्ञानिक पारदर्शिता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।