RBI की नीतियों और ग्लोबल ट्रेंड्स से तय होगा आगे का रुख

साल 2026 भारतीय रुपये के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। जनवरी में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 90 रुपये पर था, लेकिन जून तक कई बार 94-95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। यानी छह महीनों में रुपये में लगभग 4% से 5% की गिरावट दर्ज की गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये पर दबाव की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतें हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 87% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। जून 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमत 75 से 80 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी एक बड़ी वजह रही। बाजार विश्लेषकों के मुताबिक, 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाला, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हुआ।

रुपये की कमजोरी का असर आम लोगों पर भी पड़ता है। विदेश यात्रा, विदेशी शिक्षा, मोबाइल, लैपटॉप और अन्य आयातित सामान महंगे हो सकते हैं। इसके साथ ही महंगाई बढ़ने का खतरा भी रहता है।

हालांकि भारत के पास अभी 700 अरब डॉलर के करीब विदेशी मुद्रा भंडार है, जो रुपये को बड़ी गिरावट से बचाने में मदद करता है। RBI भी समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और तेल 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है, तो रुपया 96 से 98 प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि हाल में तेल की कीमतों में नरमी से रुपये को कुछ राहत मिली है।