पटना | 11 जुलाई 2026
बिहार की बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उम्मीदवार बदलने के बाद अब नए प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा का बायोडाटा राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। पहले उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ बंटी के नाम वापस लेने के बाद पार्टी ने अंतिम समय में नीरज सिन्हा को मैदान में उतारा था। अब उनके बायोडाटा में दर्ज एक तथ्य को लेकर विपक्ष ने भाजपा पर सवालों की बौछार कर दी है।
12 साल की उम्र में भाजपा की सदस्यता लेने का दावा बना विवाद
भाजपा द्वारा जारी शुरुआती बायोडाटा के अनुसार, नीरज कुमार सिन्हा का जन्म 1 जुलाई 1994 को हुआ है। वहीं उसी दस्तावेज में यह भी उल्लेख था कि उन्होंने 2006 में भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की थी। इस हिसाब से उन्होंने महज 12 वर्ष की आयु में पार्टी की सदस्यता ली थी। यही तथ्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और विपक्ष ने भाजपा की दस्तावेजी प्रक्रिया पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
विवाद बढ़ने के बाद भाजपा ने नीरज सिन्हा का संशोधित बायोडाटा जारी किया, जिसमें पार्टी से जुड़ने का वर्ष हटा दिया गया। हालांकि इस बदलाव ने विवाद को शांत करने के बजाय और अधिक चर्चाओं को जन्म दे दिया।
अभिषेक बंटी के हटने के बाद बढ़ी सियासी हलचल
इससे पहले भाजपा ने बांकीपुर सीट से अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) को उम्मीदवार घोषित किया था। उन्होंने नामांकन प्रक्रिया के बाद चुनाव लड़ने से इनकार करते हुए पारिवारिक कारणों का हवाला दिया। हालांकि राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही कि उनके परिवार से जुड़े एक पुराने कानूनी मामले की जानकारी सामने आने के बाद पार्टी ने अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने का फैसला किया।
विपक्ष ने साधा निशाना
विपक्षी दलों ने नीरज सिन्हा के बायोडाटा में हुई गलती को भाजपा की गंभीर चूक बताते हुए आरोप लगाया कि पार्टी उम्मीदवारों के दस्तावेज जारी करने से पहले तथ्यात्मक जांच तक नहीं कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर जैसी भाजपा की परंपरागत सीट पर अंतिम समय में उम्मीदवार बदलना और फिर बायोडाटा विवाद सामने आना चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े कर सकता है।
बांकीपुर में मुकाबला हुआ दिलचस्प
बांकीपुर उपचुनाव अब बेहद रोचक होता जा रहा है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर इस सीट से चुनाव मैदान में हैं और भाजपा पर लगातार हमले कर रहे हैं। वहीं राष्ट्रीय जनता दल ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा अन्य दलों की सक्रियता से चुनावी मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है। ऐसे में भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सीट बचाने की चुनौती नहीं, बल्कि संगठनात्मक साख की भी परीक्षा बन गया है।





