पटना | 1 अगस्त,
बिहार सरकार ने किसानों की फसलों को जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए बड़ा फैसला लिया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने राज्य की चयनित ग्राम पंचायतों के मुखिया को घोड़परास (नीलगाय) और जंगली सूअरों के शिकार की अनुमति देने का अधिकार सौंप दिया है। यह व्यवस्था केवल उन क्षेत्रों में लागू होगी, जहां इन वन्यजीवों के कारण फसलों को व्यापक नुकसान हो रहा है या मानव जीवन पर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
किसानों को लिखित आवेदन देना होगा
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) कार्यालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार, शिकार की अनुमति के लिए प्रभावित किसान को पहले संबंधित पंचायत के मुखिया के पास लिखित आवेदन देना होगा। बिना आवेदन के किसी भी प्रकार की अनुमति नहीं दी जाएगी। विभाग का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों की फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि अनियंत्रित शिकार को बढ़ावा देना।
वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत लागू होगी व्यवस्था
यह निर्णय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के अनुरूप लिया गया है। आदेश के मुताबिक आरक्षित वन, राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में यह व्यवस्था लागू नहीं होगी। इन क्षेत्रों में पहले से लागू वन्यजीव संरक्षण के नियम प्रभावी रहेंगे।
शिकार के बाद पालन करने होंगे सख्त नियम
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि शिकार के बाद जानवर के शव को पंचायत, वन विभाग, कृषि विभाग और जिला प्रशासन के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में दफनाया जाएगा। साथ ही शिकार के दौरान किसी अन्य व्यक्ति या किसी अन्य वन्यजीव को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित शिकारी की होगी।
गर्भवती मादा-बच्चों के शिकार पर रोक
सरकार ने सुरक्षा और संरक्षण को ध्यान में रखते हुए गर्भवती घोड़परास, गर्भवती जंगली सूअर और उनके बच्चों के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया है। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
11 जिलों में मुखिया नहीं, DFO देंगे अनुमति
राज्य के पश्चिम चंपारण, कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, गया, नवादा, नालंदा, जमुई, मुंगेर, लखीसराय और बांका जैसे वन एवं पहाड़ी क्षेत्रों में शिकार की अनुमति पंचायत के मुखिया नहीं देंगे। इन जिलों में संबंधित प्रमंडलीय वन पदाधिकारी (DFO) से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा।




