पटना, 3 अगस्त।
बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट राज्य की सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित विधानसभा सीटों में गिनी जाती है। इस सीट का चुनाव केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे राजधानी की राजनीतिक दिशा और जनमत का संकेत भी समझा जाता है। वर्तमान उपचुनाव के बीच एक बार फिर इस सीट का चुनावी इतिहास चर्चा में है, क्योंकि इसने कई बार ऐसे फैसले दिए हैं जिन्होंने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी।
पहले पटना पश्चिम, फिर बनी बांकीपुर
वर्तमान बांकीपुर विधानसभा सीट वर्ष 2008 के परिसीमन से पहले पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी। परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर बांकीपुर रखा गया, लेकिन इसकी राजनीतिक अहमियत पहले जैसी ही बनी रही। इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव 1957 में हुआ, जिसमें कांग्रेस के रामशरण साव पहले विधायक चुने गए। इसके बाद 1962 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कृष्ण बल्लभ सहाय ने जीत दर्ज की।
शुरुआती दशकों में बदलते रहे राजनीतिक समीकरण
1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा ने जीत हासिल की। उनके इस्तीफे के बाद 1969 के उपचुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के ए.के. सेन विधायक बने। 1972 में CPI के सुनील मुखर्जी ने जीत दर्ज की। 1977 की जनता लहर में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद विजयी रहे, जबकि 1980 में कांग्रेस के रणजीत सिन्हा ने सीट दोबारा कांग्रेस के खाते में पहुंचा दी।
1985 का सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर
बांकीपुर के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर 1985 में देखने को मिला, जब निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने सभी प्रमुख दलों को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। यह परिणाम आज भी इस सीट के सबसे अप्रत्याशित चुनावी नतीजों में गिना जाता है।
1995 से भाजपा का अभेद्य गढ़
वर्ष 1995 से इस सीट की राजनीति ने नया मोड़ लिया। भाजपा के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने पहली बार जीत दर्ज की और इसके बाद 2000, फरवरी 2005 तथा अक्टूबर 2005 में लगातार चुनाव जीतकर भाजपा को मजबूत आधार दिया।
2006 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने 2010, 2015, 2020 और 2025 में लगातार जीत दर्ज कर भाजपा का वर्चस्व कायम रखा।
परिसीमन के बाद भी नहीं टूटा भाजपा का रिकॉर्ड
2008 में सीट का नाम बदलकर बांकीपुर कर दिया गया, पर भाजपा का विजय अभियान जारी रहा।
- 2010: नितिन नवीन ने 60,840 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
- 2015: 39,767 वोटों से जीत।
- 2020: 39,036 वोटों से जीत।
- 2025: 63 प्रतिशत मत हासिल करते हुए 51 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
लगातार तीन दशक से अधिक समय तक इस सीट पर भाजपा का दबदबा बना रहा।
कई बड़े नेताओं को मिली हार
बांकीपुर सीट कई चर्चित नेताओं की हार की भी गवाह रही है।
- 2020 में अभिनेता लव सिन्हा भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए।
- पुष्पम प्रिया चौधरी भी इस सीट से जीत दर्ज नहीं कर सकीं।
- पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय को भी इस क्षेत्र से हार का सामना करना पड़ा।
- भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री राम कृपाल यादव भी इस क्षेत्र से चुनाव हार चुके हैं।
1957 से 2025 तक बांकीपुर के विजेता
वर्ष —— विजेता
1957-रामशरण साव (कांग्रेस)
1962-कृष्ण बल्लभ सहाय (कांग्रेस)
1967-महामाया प्रसाद सिन्हा
1969 (उपचुनाव)
ए.के. सेन (CPI)
1972-सुनील मुखर्जी (CPI)
1977-ठाकुर प्रसाद (जनता पार्टी)
1980-रणजीत सिन्हा (कांग्रेस)
1985-रामानंद यादव (निर्दलीय)
1995 -नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा (भाजपा)
2000-नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा (भाजपा)
2005 (फरवरी) -नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा (भाजपा)
2005 (अक्टूबर)- नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा (भाजपा)
2006 (उपचुनाव) -नितिन नवीन (भाजपा)
2010- नितिन नवीन (भाजपा)
2015-नितिन नवीन (भाजपा)
2020- नितिन नवीन (भाजपा)
2025 -नितिन नवीन (भाजपा)
उपचुनाव ने बढ़ाई राजनीतिक दिलचस्पी
2026 के बांकीपुर उपचुनाव ने इस सीट को फिर सुर्खियों में ला दिया है। एक ओर भाजपा अपने तीन दशक पुराने गढ़ को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, वहीं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बना दिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि क्या बांकीपुर अपने पुराने राजनीतिक इतिहास को दोहराएगा या फिर एक नया अध्याय लिखेगा।




