ब्रासीलिया, 8 सितंबर 2026। तेजी से बढ़ने वाले यूकेलिप्टस के पेड़ लंबे समय से कागज और लकड़ी के उद्योग के लिए उपयोगी माने जाते रहे हैं, मगर दुनिया के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर लगाए गए इन पेड़ों को लेकर अब Environmental Impact पर सवाल उठ रहे हैं। दक्षिण अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक हुई अलग-अलग स्टडी में यूकेलिप्टस के बड़े बागानों और भूजल, मिट्टी व स्थानीय जल संसाधनों के बीच संबंधों को लेकर चिंता सामने आई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक समस्या केवल पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि बड़े इलाकों में प्राकृतिक घासभूमि या अन्य वनस्पतियों की जगह एक ही प्रजाति के बड़े पैमाने पर लगाए जाने से भी जुड़ी है।

ब्राजील में भूजल गिरने का दावा

ब्राजील में यूकेलिप्टस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल पल्प और पेपर इंडस्ट्री के लिए किया जाता है। तेजी से बढ़ने वाले इन पेड़ों से कम समय में औद्योगिक कच्चा माल तैयार किया जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, मिनास गैरेस के एक यूकेलिप्टस उत्पादक क्षेत्र में करीब 45 वर्षों के दौरान भूजल स्तर में 4.5 मीटर की गिरावट दर्ज की गई। स्थानीय स्तर पर इस तरह के इलाकों को 'ग्रीन डेजर्ट' यानी हरा रेगिस्तान तक कहा जाने लगा है।

अर्जेंटीना में आसपास के भूजल पर भी असर

अर्जेंटीना के पम्मास क्षेत्र में किए गए अध्ययन ने भी यूकेलिप्टस के बागानों को लेकर चिंता बढ़ाई है। 1951 में लगाए गए 40 हेक्टेयर के एक बागान पर दो साल तक अध्ययन किया गया। शोध में पाया गया कि आसपास की घासभूमि की तुलना में यूकेलिप्टस वाले क्षेत्र में भूजल का स्तर 0.5 मीटर से अधिक नीचे था। अध्ययन के अनुसार पेड़ों द्वारा पानी के इस्तेमाल से जमीन के नीचे एक तरह का जल-ढाल बन सकता है, जिसके कारण आसपास की घासभूमि से भी पानी बागान की दिशा में बहने लगता है।

उरुग्वे में 17 साल बाद पानी में 35% कमी

उरुग्वे में करीब दो दशक तक किए गए अध्ययन में दो नजदीकी वॉटरशेड की तुलना की गई। एक क्षेत्र को प्राकृतिक चरागाह के रूप में बनाए रखा गया, जबकि दूसरे में यूकेलिप्टस और पाइन के पेड़ लगाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, पेड़ लगाए जाने के करीब 17 साल बाद जंगल वाले वॉटरशेड में घासभूमि की तुलना में पानी की उपलब्धता 35 फीसदी कम पाई गई। यह अध्ययन इस बात की ओर संकेत करता है कि बड़े पैमाने पर लगाए गए पेड़ों का स्थानीय जल चक्र पर असर पड़ सकता है।

रवांडा में मिट्टी की गुणवत्ता को लेकर चिंता

पूर्वी अफ्रीका के रवांडा में भी यूकेलिप्टस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल को लेकर अध्ययन किए गए हैं। यहां यूकेलिप्टस वन बागानों में प्रमुख प्रजाति बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, रवांडा के वन बागानों में यूकेलिप्टस की हिस्सेदारी करीब 78 फीसदी तक बताई गई है। वैज्ञानिकों ने पेड़ों द्वारा बड़ी मात्रा में पोषक तत्वों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। इससे लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता और दूसरे कृषि उपयोगों के लिए उसकी उत्पादकता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई है।

अफ्रीका में दशकों से बढ़ रहा यूकेलिप्टस का विस्तार

1970 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया, रवांडा, युगांडा, केन्या और सूडान में यूकेलिप्टस के बागान करीब 95,684 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए थे। इनमें अकेले रवांडा का हिस्सा लगभग 23 हजार हेक्टेयर बताया गया था। तेजी से बढ़ने की क्षमता के कारण यूकेलिप्टस को कई देशों में वानिकी और औद्योगिक उत्पादन के लिए बढ़ावा मिला। हालांकि, अब वैज्ञानिक इसके बड़े पैमाने पर लगाए जाने के Water Consumption और Soil Health पर पड़ने वाले असर को समझने पर जोर दे रहे हैं।

यूकेलिप्टस पर क्यों उठ रहे सवाल ?

यूकेलिप्टस को लेकर सामने आई स्टडी का मुख्य मुद्दा यह है कि जब इसे बड़े पैमाने पर एकल प्रजाति के बागान के रूप में लगाया जाता है, तो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव हो सकता है।

इसमें खास तौर पर तीन मुद्दे प्रमुख हैं :

  • भूजल उपलब्धता पर संभावित असर
  • मिट्टी से पोषक तत्वों के इस्तेमाल की चिंता
  • प्राकृतिक घासभूमि और स्थानीय वनस्पतियों में बदलाव

हालांकि यूकेलिप्टस के पर्यावरणीय प्रभाव जगह, जलवायु, मिट्टी, पेड़ की उम्र और प्रबंधन जैसे कई कारकों पर निर्भर कर सकते हैं। इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों के परिणामों को एक ही निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।