नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026 : अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने दुनिया के कई देशों के सामने अपनी विदेश नीति और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने की एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित समझौतों को लेकर भी कई देशों में चिंता जताई जा रही है। ऐसे माहौल में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर का ‘बिना छाते के बारिश में रहना सीख लिया’ वाला बयान काफी चर्चा में है। विदेश मंत्री जयशंकर का यह संदेश भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीति की सोच को सामने रखता है। इसका मतलब है कि भारत किसी एक महाशक्ति के खेमे में शामिल होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने की नीति पर जोर देता है।

अमेरिका-चीन के G2 से क्यों चिंतित हैं दूसरे देश ?

वैश्विक राजनीति में ‘G2’ शब्द का इस्तेमाल अमेरिका और चीन के बीच ऐसी व्यवस्था या साझेदारी की आशंका के संदर्भ में किया जाता है, जिसमें दोनों महाशक्तियां अंतरराष्ट्रीय मामलों पर असाधारण प्रभाव डाल सकें। ऐसी स्थिति में छोटे और मध्यम देशों को डर हो सकता है कि व्यापार, सुरक्षा, तकनीक और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े फैसलों में उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलेगा। अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ विवाद, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव ने इस चिंता को और बढ़ाया है। हालांकि, दोनों देशों के बीच किसी व्यापक G2 समझौते को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता है।

जयशंकर ने क्या कहा था ?

नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलावों और देशों की भूमिका पर चर्चा हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की विदेश नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं रहा है और उसने ‘बिना छाते के बारिश में रहना’ सीख लिया है। इस टिप्पणी का आशय यह है कि भारत अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और महाशक्तियों के दबाव के बीच अपने फैसले खुद लेने की क्षमता बनाए रखना चाहता है। भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि देश अलग-अलग मुद्दों पर अपने हितों के अनुसार विभिन्न देशों के साथ सहयोग कर सकता है, लेकिन किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचने की कोशिश करता है।

ऋषि सुनक ने बताया छोटे देशों के लिए क्या है रास्ता

रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में मध्यम शक्तियों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि देशों को हर क्षेत्र में सबसे बड़ा बनने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय उन्हें ऐसे खास क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल करनी चाहिए, जिनकी दुनिया को जरूरत हो। इस संदर्भ में नीदरलैंड की कंपनी ASML का उदाहरण दिया गया, जो अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर निर्माण में इस्तेमाल होने वाली EUV लिथोग्राफी मशीनों की प्रमुख और विशिष्ट निर्माता है। इसी तरह, जर्मनी के उन्नत ऑप्टिकल उपकरण, दक्षिण कोरिया की मेमोरी चिप इंडस्ट्री और जापान की सेमीकंडक्टर सामग्री से जुड़ी विशेषज्ञता वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में अहम भूमिका निभाती है। इस रणनीति का मूल विचार है कि कोई देश किसी खास तकनीक, संसाधन या उत्पाद में इतना मजबूत बने कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाए।

क्या भारत को ‘मध्यम शक्ति’ कहना सही है ?

रिपोर्ट के अनुसार, जयशंकर ने भारत को केवल ‘मध्यम शक्ति’ के रूप में सीमित करके देखने पर सवाल उठाया। भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता, विशाल बाजार, रणनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय भूमिका को देखते हुए उसकी स्थिति को व्यापक नजरिए से समझने की जरूरत है। भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों के साथ सहयोग करता है, तो दूसरी ओर अपने हितों के आधार पर रूस और अन्य देशों के साथ भी संबंध बनाए रखता है। यही संतुलन उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में कैसे मजबूत बन सकते हैं देश ?

ऊर्जा सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज और मजबूत घरेलू उत्पादन क्षमता आने वाले समय में देशों की रणनीतिक ताकत तय करने वाले प्रमुख क्षेत्र हो सकते हैं। जो देश इन क्षेत्रों में अपनी निर्भरता कम करेंगे और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका बनाएंगे, उनके लिए अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच अपने हितों की रक्षा करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। भारत के लिए भी तकनीकी निर्माण, ऊर्जा के विविध स्रोत, घरेलू उद्योग और निर्यात क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण है।

क्या भारत का फॉर्मूला दूसरे देशों के काम आएगा ?

जयशंकर की रणनीतिक स्वायत्तता की सोच उन देशों के लिए एक उपयोगी दृष्टिकोण पेश करती है, जो अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता सुरक्षित रखना चाहते हैं। हालांकि हर देश की आर्थिक स्थिति, सैन्य क्षमता और कूटनीतिक जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए भारत के मॉडल को हू-ब-हू अपनाने के बजाय प्रत्येक देश को अपनी परिस्थितियों के अनुसार अलग स्वहित में रणनीति बनानी होगी। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा के बीच भारत का संदेश स्पष्ट है कि वैश्विक राजनीति में अपनी जगह बनाए रखने के लिए किसी एक खेमे पर निर्भर रहना बहुत जरूरी नहीं है। मजबूत घरेलू क्षमता, विविध अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां और स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति किसी भी देश को अधिक प्रभावशाली बना सकती हैं।