नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026 : भारत में BRICS Summit 2026 को लेकर तैयारियां अंतिम दौर में हैं। 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले इस शिखर सम्मेलन में दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और उभरती शक्तियों के नेता शामिल होने जा रहे हैं। भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदस्य देशों के साथ-साथ पार्टनर देशों के प्रतिनिधियों की मेजबानी करेंगे। इस बड़े कूटनीतिक आयोजन के बीच पाकिस्तान की BRICS में शामिल होने की कोशिश एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान ने संगठन की पूर्ण सदस्यता के लिए आवेदन किया था और उसे चीन की ओर से समर्थन भी मिला, मगर इसके बावजूद वह अब तक BRICS का सदस्य नहीं बन सका है।
BRICS Summit में कौन-कौन देश होंगे शामिल ?
BRICS का विस्तार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हुआ है। शुरुआती पांच देशों के समूह से आगे बढ़ते हुए अब संगठन में 11 पूर्ण सदस्य हैं। इनमें भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। नई दिल्ली में होने वाले सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो समेत कई प्रमुख नेताओं की भागीदारी रहेगी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की मौजूदगी भी इस सम्मेलन के वैश्विक महत्व को बढ़ाएगी।
पार्टनर देशों की भूमिका भी होगी अहम
BRICS ने पूर्ण सदस्य देशों के अलावा Partner Country व्यवस्था भी शुरू की है। इस व्यवस्था में बेलारूस, कजाकिस्तान, मलेशिया, थाईलैंड, क्यूबा, नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान और युगांडा जैसे देश शामिल हैं। बाद में वियतनाम भी इस व्यवस्था का हिस्सा बना। इससे BRICS का दायरा एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका तक फैल गया है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए सिर्फ पूर्ण सदस्यता ही नहीं, बल्कि पार्टनर कंट्री का दर्जा हासिल करना भी एक अहम लक्ष्य रहा है।
पाकिस्तान BRICS में क्यों नहीं बन पाया सदस्य ?
पाकिस्तान ने अगस्त 2023 में BRICS की पूर्ण सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था। चीन ने उसकी दावेदारी का समर्थन किया था और रूस की ओर से भी सकारात्मक संकेत मिले थे। लेकिन BRICS में नए सदस्य को शामिल करने का फैसला सर्वसम्मति से होता है। यानी किसी नए देश की सदस्यता के लिए मौजूदा सदस्यों के बीच सहमति जरूरी होती है। यही वजह है कि इसे सीधे तौर पर किसी एक देश का ‘वीटो’ कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। हालांकि भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक और सुरक्षा तनाव के कारण पाकिस्तान की सदस्यता का रास्ता आसान नहीं रहा है। भारत सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पाकिस्तान के खिलाफ अपनी आपत्तियां पहले भी जाहिर करता रहा है।
चीन के समर्थन के बावजूद क्यों नहीं खुला रास्ता ?
पाकिस्तान को उम्मीद थी कि चीन के समर्थन से उसकी BRICS सदस्यता की राह आसान हो सकती है। लेकिन केवल चीन का समर्थन पर्याप्त नहीं है। BRICS में सदस्यता के लिए व्यापक सहमति जरूरी है। ऐसे में भारत की असहमति के बीच पाकिस्तान के लिए सर्वसम्मति हासिल करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा चीन और पाकिस्तान के द्विपक्षीय रिश्तों में भी हाल के वर्षों में सुरक्षा और निवेश से जुड़े मुद्दे सामने आते रहे हैं। पाकिस्तान में चीनी नागरिकों और परियोजनाओं की सुरक्षा को लेकर बीजिंग की चिंताएं कई बार सामने आई हैं।
आर्थिक स्थिति भी पाकिस्तान के लिए चुनौती
BRICS भले ही अब केवल आर्थिक ताकतों का समूह नहीं रह गया है, लेकिन वैश्विक व्यापार, निवेश और आर्थिक क्षमता अभी भी इसकी अहम पहचान है। पाकिस्तान पिछले वर्षों में आर्थिक संकट, महंगाई, विदेशी मुद्रा की कमी और कर्ज के दबाव से जूझता रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से उसे बार-बार वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ी है। ऐसे में BRICS में सदस्यता के लिए पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी उसके सामने एक चुनौती मानी जाती है।
पार्टनर कंट्री की सूची में भी पाकिस्तान बाहर
पाकिस्तान के लिए परेशानी सिर्फ पूर्ण सदस्यता तक सीमित नहीं रही। 2024 के कजान शिखर सम्मेलन के बाद BRICS ने पार्टनर देशों की व्यवस्था को आगे बढ़ाया। 2025 से बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान को पार्टनर देशों के रूप में शामिल किया गया। बाद में वियतनाम भी इस समूह का हिस्सा बना। लेकिन पाकिस्तान इस सूची में जगह नहीं बना सका।
भारत के लिए BRICS Summit क्यों अहम?
नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit भारत के लिए सिर्फ एक बहुपक्षीय बैठक नहीं है। इसके जरिए भारत व्यापार, निवेश, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, सप्लाई चेन और वैश्विक शासन में सुधार जैसे मुद्दों पर अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है। चीन, रूस, ईरान और अन्य प्रमुख देशों के नेताओं की मौजूदगी भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा सम्मेलन के दौरान कारोबारी प्रतिनिधिमंडलों की भागीदारी से तकनीक, बैंकिंग, ऊर्जा, खनन और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
पाकिस्तान के लिए BRICS की राह क्यों मुश्किल?
कुल मिलाकर पाकिस्तान के लिए BRICS की सदस्यता का रास्ता कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है। चीन या रूस जैसे देशों का समर्थन अकेले पर्याप्त नहीं है। संगठन में नए सदस्य के लिए व्यापक सहमति जरूरी है। भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंध, सुरक्षा संबंधी चिंताएं, पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और BRICS के भीतर बदलती रणनीतिक प्राथमिकताएं—इन सभी का असर उसकी दावेदारी पर पड़ सकता है। ऐसे में नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit पाकिस्तान के लिए सिर्फ बाहर रहने का मुद्दा नहीं, बल्कि यह भी दिखाएगा कि बदलती वैश्विक कूटनीति में भारत की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो रही है।




