नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026 : भारत-रूस संबंधों और रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका के बढ़ते दबाव के बीच रूस के सरकारी मीडिया संस्थान इजवेस्टिया ने भारत, रूस और चीन के रिश्तों को लेकर एक विश्लेषण प्रकाशित किया है। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि अगर अमेरिकी दबाव के कारण भारत रूसी तेल खरीद में बड़ी कटौती करता है और पश्चिमी देशों के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाता है तो रूस और चीन के संबंध और मजबूत हो सकते हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से संबंधित प्रतिबंध कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिलता है। हालांकि कानून किसी देश पर 100% टैरिफ अपने-आप लागू नहीं करता; इसका इस्तेमाल अमेरिकी प्रशासन के निर्णय पर निर्भर है।

रूसी मीडिया ने क्या कहा ?

इजवेस्टिया के विश्लेषण में दावा किया गया है कि अमेरिका और पश्चिमी देश भारत पर रूस से दूरी बनाने के लिए दबाव बढ़ा सकते हैं। रिपोर्ट में अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था, रूस से भारत की ऊर्जा खरीद और भारत के पश्चिमी देशों के साथ संभावित समुद्री सुरक्षा सहयोग को एक-दूसरे से जोड़कर देखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि भारत रूसी तेल खरीद कम करता है और पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ाता है, तो रूस के सामने चीन के साथ अपने संबंध और मजबूत करने का विकल्प हो सकता है। यह रूसी मीडिया का विश्लेषण है, न कि भारत या रूस सरकार की आधिकारिक नीति की घोषणा।

ट्रंप के नए कानून से भारत पर क्या असर ?

18 सितंबर 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर हस्ताक्षर किए। कानून रूस की ऊर्जा और रक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ उन देशों पर भी संभावित टैरिफ का प्रावधान करता है जो रूसी तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन दुनिया के प्रमुख रूसी ऊर्जा खरीदारों में शामिल हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर “भारत पर 100% टैरिफ लग गया” कहना सही नहीं होगा। मौजूदा कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकतम 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति देता है; वास्तविक दर और लक्षित देश प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेंगे।

भारत की रूसी तेल खरीद में आई कमी

हालिया आंकड़ों के मुताबिक भारत के रूसी कच्चे तेल के आयात में अगस्त 2026 में करीब 16.5% की गिरावट आई और आयात लगभग 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा। प्रारंभिक सितंबर आंकड़ों में यह करीब 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। इसके बावजूद रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियां अक्टूबर-नवंबर की जरूरतों के लिए स्पॉट मार्केट से भी तेल खरीद रही हैं, जबकि ऊर्जा सुरक्षा और संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच आपूर्ति स्रोतों में विविधता पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

चीन के साथ रूस की नजदीकी का क्या संदर्भ है ?

रूसी मीडिया ने अमेरिका-चीन संबंधों में संभावित बदलाव को भी भारत-रूस संबंधों के संदर्भ में देखा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सितंबर में बातचीत और व्यापार तनाव कम करने की संभावनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है। इजवेस्टिया के विश्लेषण में आशंका जताई गई है कि यदि अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में सुधार आता है और साथ ही भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव बढ़ता है, तो रूस अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में चीन को और महत्व दे सकता है।

होर्मुज और बाब-अल-मंदेब पर भी नजर

इस रिपोर्ट में पश्चिमी देशों के साथ भारत के संभावित समुद्री सुरक्षा सहयोग का भी उल्लेख किया गया है। खासकर होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में नौवहन की सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है। हालिया घटनाक्रम में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी होर्मुज और बाब-अल-मंदेब से सुरक्षित और निर्बाध समुद्री आवाजाही के महत्व पर विस्तार से चर्चा की थी।

क्या रूस के चीन के करीब जाने से भारत-रूस संबंध बदलेंगे ?

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि रूस चीन के और करीब जाएगा या भारत-रूस संबंधों में बड़ा बदलाव आएगा। इजवेस्टिया की रिपोर्ट ने इसे संभावित भू-राजनीतिक परिदृश्य के तौर पर पेश किया है। भारत एक साथ रूस, अमेरिका और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ अपने रणनीतिक व आर्थिक संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। वहीं रूसी तेल खरीद, अमेरिकी प्रतिबंध और पश्चिम एशिया में समुद्री सुरक्षा की स्थिति आने वाले समय में इस संतुलन को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।