रियाद, 3 अक्टूबर 2026 : पाकिस्तान ने मक्का पैक्ट के तहत सऊदी अरब को सैन्य मदद देने का फैसला किया है। इस तरह पाकिस्तान ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब में 40,000 सैनिकों को तैनात किया है। यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर सऊदी अरब की तैयारियों के बीच पाकिस्तान की भूमिका सामने आई है। एक एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने सऊदी अरब की सुरक्षा मजबूत करने के लिए सैनिकों और सैन्य उपकरणों की तैनाती की है। रिपोर्ट में पाकिस्तानी अधिकारियों और पश्चिमी राजनयिकों के हवाले से 30,000 से 40,000 पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती का दावा किया गया है। इसके अलावा पाकिस्तान की ओर से एयर डिफेंस, एंटी-ड्रोन सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरण सऊदी अरब के सहयोगी बलों तक पहुंचाए जाने की बात कही गई है।
मक्का पैक्ट के बाद पाकिस्तान-सऊदी सैन्य सहयोग
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा सहयोग को हाल के समझौतों के संदर्भ में देखा जा रहा है। सऊदी अरब की सीमा सुरक्षा और संभावित ड्रोन-मिसाइल हमलों से बचाव में पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तानी सैनिकों की 30,000-40,000 संख्या और उनकी वास्तविक भूमिका के बारे में उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से अधिकारियों के हवाले पर आधारित है। इसे हूतियों के खिलाफ सीधे जमीनी युद्ध में पाकिस्तान की औपचारिक भागीदारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जब तक दोनों देशों की ओर से इसकी स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि न हो।
यमन में हूतियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन की तैयारी ?
Reuters के मुताबिक सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। इनमें लाल सागर के तटीय इलाकों और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास हूती प्रभाव को कम करना तथा यमन के अलग-अलग हिस्सों से सैन्य दबाव बनाना शामिल है। संभावित अभियान में यमन की सरकार समर्थित सेनाओं की मुख्य भूमिका हो सकती है, जबकि सऊदी अरब हवाई सहायता उपलब्ध करा सकता है। रिपोर्ट में खाड़ी और यमन के अधिकारियों व पश्चिमी राजनयिकों के हवाले से कहा गया है कि प्रस्तावित अभियान का एक उद्देश्य हूतियों की बढ़त को पीछे धकेलना भी है।
पाकिस्तान ने भेजे एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन सिस्टम
पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से Reuters की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने सऊदी सहयोगी बलों की मदद के लिए सैन्य उपकरण भी भेजे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, चार कार्गो विमानों के जरिए एयर डिफेंस सिस्टम, हल्की तोपें, ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम जैसे उपकरण भेजे जाने की बात कही गई है। इसके साथ ही पाकिस्तानी सैन्य सलाहकारों के सऊदी अधिकारियों के साथ काम करने का भी दावा किया गया है। इन सैन्य प्रणालियों का प्रमुख उद्देश्य ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी क्षेत्र तथा महत्वपूर्ण सैन्य एवं रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करना बताया गया है।
सऊदी के साथ अमेरिका और तुर्की भी
यमन में संभावित अभियान के बीच सऊदी अरब को अन्य देशों से भी सैन्य सहयोग मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका सीधे तौर पर सऊदी जमीनी अभियान में शामिल होने के बजाय खुफिया जानकारी और अन्य सैन्य सहायता उपलब्ध करा रहा है। वहीं तुर्की से खरीदे गए ड्रोन भी क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है। फ्रांस की भूमिका भी सऊदी अरब के महत्वपूर्ण बंदरगाह और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा से जुड़ी बताई गई है।
यमन में जमीनी लड़ाई क्यों मुश्किल हो सकती है ?
यमन में हूतियों के खिलाफ किसी बड़े जमीनी अभियान की सफलता स्थानीय सऊदी समर्थित और हूती-विरोधी गुटों की सैन्य क्षमता पर काफी हद तक निर्भर करेगी। यमन में कई अलग-अलग सशस्त्र गुट सक्रिय हैं और उनके बीच राजनीतिक एवं क्षेत्रीय मतभेद भी रहे हैं। ऐसे में अलग-अलग समूहों को एक साझा सैन्य अभियान में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करना बड़ी चुनौती हो सकता है। Reuters से बातचीत में यमन मामलों के विश्लेषक मोहम्मद अल्बाशा ने भी हूती-विरोधी ताकतों की संगठनात्मक क्षमता को लेकर चुनौतियों की ओर इशारा किया।
बाब अल-मंदेब पर नियंत्रण क्यों अहम ?
बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार के लिए इसकी रणनीतिक अहमियत काफी अधिक है। इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का असर केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं रह सकता। लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।
आगे क्या होगा ?
सऊदी अरब की ओर से हूतियों के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान की तैयारियों की रिपोर्ट के बीच पाकिस्तान की सैन्य सहायता और तैनाती पर भी नजर है। हालांकि संभावित अभियान का वास्तविक स्वरूप, पाकिस्तान की भूमिका और जमीनी युद्ध में उसकी भागीदारी को लेकर कई विवरण अभी रिपोर्टों और अधिकारियों के दावों पर आधारित हैं। यदि यमन में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू होती है तो इसका असर लाल सागर, बाब अल-मंदेब और मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति पर पड़ सकता है।




