नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026 : भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। 1960 में हुई इस संधि ने दोनों देशों के बीच सिंधु नदी तंत्र की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल का ढांचा तय किया था। विश्व बैंक के मुताबिक संधि के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां तथा रावी, व्यास और सतलुज को पूर्वी नदियां माना गया है। भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को ‘अब eyance’ में रखने का फैसला किया था। इसके बाद पाकिस्तान की ओर से भारत के फैसले पर लगातार आपत्ति जताई गई है। पाकिस्तान का तर्क है कि उसकी कृषि और बड़ी आबादी सिंधु नदी तंत्र के पानी पर निर्भर है। इसी बीच एक रणनीतिक विश्लेषण में पाकिस्तान के जल संकट को लेकर अलग तस्वीर पेश की गई है। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान की पानी से जुड़ी समस्याओं के लिए केवल भारत को जिम्मेदार ठहराना सही तस्वीर नहीं दिखाता। पाकिस्तान के भीतर जल प्रबंधन, सिंचाई व्यवस्था, भूजल और पानी की बर्बादी जैसी समस्याएं भी इस संकट में अहम भूमिका निभाती हैं।

1960 में हुई थी सिंधु जल संधि

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक ने इस समझौते की बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। संधि ने पूर्वी और पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और सीमाएं तय कीं। संधि के तहत पूर्वी नदियों—रावी, व्यास और सतलुज—के पानी का इस्तेमाल मुख्य रूप से भारत के लिए निर्धारित किया गया, जबकि पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—के पानी के इस्तेमाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के लिए तय किया गया। हालांकि, पश्चिमी नदियों पर भी भारत को कुछ निर्धारित उपयोगों, जिनमें घरेलू इस्तेमाल, कृषि और जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं, की अनुमति है।

पाकिस्तान के जल संकट पर क्या कहा गया ?

रणनीतिक विश्लेषक जहाक तनवीर के विश्लेषण के अनुसार पाकिस्तान का जल संकट केवल भारत की नीतियों या बांधों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक पाकिस्तान के अंदर पानी के इस्तेमाल और प्रबंधन में गंभीर कमियां हैं। इस दावे के संदर्भ में विश्व बैंक के आंकड़े अहम हैं। विश्व बैंक के अनुसार पाकिस्तान के सिंध प्रांत में निकाले जाने वाले पानी का अनुमानित 60 से 75 फीसदी हिस्सा सतही वाष्पीकरण या खारे भूजल में रिसाव के कारण बर्बाद हो जाता है। सिंध में कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा सिंचाई पर निर्भर है और कृषि ही पानी की निकासी का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान की जल समस्या में घरेलू जल-प्रबंधन की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत-पाकिस्तान के बीच नदी जल विवाद या सिंधु नदी तंत्र पर दोनों देशों की निर्भरता महत्वहीन है।

पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकार क्या हैं ?

सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल का प्रमुख अधिकार मिला है, मगर भारत के लिए भी कुछ उपयोग की अनुमति निर्धारित है। विश्व बैंक के अनुसार भारत पश्चिमी नदियों पर कुछ शर्तों के साथ जलविद्युत परियोजनाएं बना सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पहले भी विवाद रहा है। विश्व बैंक ने 2022 में बताया था कि दोनों देशों ने इन परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन को लेकर अलग-अलग आपत्तियां उठाई थीं और संधि में निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत Neutral Expert तथा Court of Arbitration से जुड़ी प्रक्रियाएं आगे बढ़ी थीं। इसलिए पश्चिमी नदियों पर भारत की परियोजनाओं को सीधे तौर पर ‘पानी रोकने’ के बराबर मानना संधि की तकनीकी व्यवस्था को पूरी तरह नहीं दर्शाता।

पाकिस्तान के लिए पानी की चुनौती कितनी बड़ी है ?

पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था सिंधु नदी बेसिन से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में नदी के प्रवाह, सिंचाई और जल भंडारण में किसी भी बड़े बदलाव का असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, विश्व बैंक ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पानी के इस्तेमाल की दक्षता, भूजल और सिंचाई व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चुनौतियों को भी दर्ज किया है। यही वजह है कि पाकिस्तान का जल संकट केवल भारत-पाकिस्तान विवाद का विषय नहीं है। इसमें जल प्रबंधन, सिंचाई की दक्षता, भूजल का इस्तेमाल, जल भंडारण और कृषि पद्धतियां भी महत्वपूर्ण कारक हैं।

संधि पर भारत-पाकिस्तान के बीच जारी है विवाद

भारत का 2025 में सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला पहलगाम आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बिगड़े संबंधों के बीच आया। पाकिस्तान इस फैसले का विरोध करता रहा है, जबकि भारत ने इसे अपनी सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों के व्यापक संदर्भ से जोड़कर देखा है। ऐसे में सिंधु जल संधि अब केवल पानी के बंटवारे का तकनीकी समझौता नहीं रह गई है। यह भारत-पाकिस्तान के बीच सुरक्षा, कूटनीति, कानूनी प्रक्रिया और जल संसाधनों से जुड़े व्यापक विवाद का हिस्सा बन चुकी है।