इस्लामाबाद, 12 सितंबर 2026 : बलूचिस्तान में लगातार बढ़ते हिंसक हमलों और पाकिस्तानी सुरक्षाबलों को हो रहे नुकसान के बीच अब पाकिस्तान की सेना के सुर बदलते नजर आ रहे हैं। लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई के जरिए बलूचिस्तान की समस्या का समाधान तलाशने वाली पाकिस्तानी सेना अब स्थायी शांति के लिए बातचीत और राजनीतिक रणनीति की जरूरत पर जोर दे रही है।फील्ड मार्शल असीम मुनीर के बलूचिस्तान दौरे के बाद पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई के वरिष्ठ अधिकारियों की क्षेत्र में गतिविधियां काफी बढ़ गई
हैं। शुक्रवार को क्वेटा में सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बलूचिस्तान की जटिल समस्याओं का स्थायी समाधान केवल ताकत के इस्तेमाल से संभव नहीं है।
पाकिस्तानी सेना ने माना- गोलियों से नहीं निकलेगा समाधान
पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी के मुताबिक, बलूचिस्तान की समस्या का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं किया जा सकता। इसके लिए बलूच लोगों के साथ बातचीत और लंबी अवधि की रणनीति जरूरी है। अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान को बलूचिस्तान के लिए ऐसी रणनीति बनानी होगी, जो केवल तत्काल सुरक्षा संकट तक सीमित न हो, बल्कि अगले कई वर्षों को ध्यान में रखकर तैयार की जाए। उन्होंने यह भी दावा किया कि बलूचिस्तान के अधिकांश लोग पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब बलूचिस्तान में अलगाववादी संगठनों के हमलों के चलते पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर दबाव बढ़ा है। हाल के हमलों में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं।
चौकियों और सुरक्षा ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता
बलूचिस्तान में लंबे समय से पाकिस्तानी सेना और बलूच विद्रोही संगठनों के बीच संघर्ष जारी है। बलूच संगठनों का आरोप है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में आम नागरिकों को भी निशाना बनाया गया और कई लोगों के लापता होने के मामले सामने आए। दूसरी ओर, पाकिस्तानी सेना लगातार हथियार उठाने वाले संगठनों के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने की बात कहती रही है। ऐसे में सेना की ओर से बातचीत और राजनीतिक समाधान पर दिया गया नया जोर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक वरिष्ठ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी ने कहा कि बलूचिस्तान में जीत के लिए केवल युद्ध नहीं, बल्कि शांति जरूरी है।
क्या बदल रही है पाकिस्तान की रणनीति ?
पाकिस्तानी सेना की ओर से बातचीत की बात को रणनीति में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि हथियारबंद संगठनों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। यानी एक तरफ पाकिस्तान सैन्य अभियान को जारी रखने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर समाधान तलाशने की जरूरत भी स्वीकार कर रहा है। यही विरोधाभास बलूचिस्तान को लेकर पाकिस्तान की मौजूदा रणनीति को खास बनाता है।
ग्वादर को लेकर भी उठ रहे सवाल
बलूचिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में से एक ग्वादर को लेकर भी लंबे समय से राजनीतिक और रणनीतिक बहस होती रही है। आलोचकों का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार और सेना क्षेत्र पर अपना नियंत्रण मजबूत करना चाहती है, जबकि बलूच संगठन इसे अपने अधिकारों और पहचान के खिलाफ कदम मानते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, अगर बलूचिस्तान में हिंसा को रोकना है तो केवल सुरक्षा अभियान पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय आबादी के राजनीतिक अधिकार, विकास, संसाधनों पर हिस्सेदारी और भरोसे का संकट भी हल करना होगा।
पाकिस्तान के सामने बड़ी सुरक्षा और राजनीतिक चुनौती
बलूचिस्तान में लगातार जारी हिंसा ने पाकिस्तान के सामने बड़ी सुरक्षा और राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में पाकिस्तानी सेना का 'गोलियों से नहीं, बातचीत से समाधान' वाला संदेश यह संकेत देता है कि इस समस्या को केवल सैन्य ताकत से नियंत्रित करना मुश्किल साबित हो रहा है। हालांकि, आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पाकिस्तान की सेना और सरकार वास्तव में बातचीत की दिशा में कदम बढ़ाती हैं या यह केवल रणनीतिक बयान बनकर रह जाता है।




