जिनेवा/इस्लामाबाद, 3 अक्टूबर 2026 : सिंधु जल संधि यानी Indus Waters Treaty (IWT) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र के दौरान आयोजित एक कार्यक्रम में पाकिस्तान की ओर से भारत के संधि को अस्थायी रूप से रोकने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई गई है। पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर लाखों लोगों की आजीविका, खेती और पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। पाकिस्तानी पक्ष ने संधि को बहाल करने की मांग भी उठाई है।
UNHRC के कार्यक्रम में क्या चर्चा हुई ?
जिनेवा में आयोजित कार्यक्रम का विषय 'जल न्याय और जलवायु लचीलापन: दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में सीमा-पार सहयोग को बढ़ावा देना' था। इसमें कानूनी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, राजनयिकों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने सीमा-पार नदियों, अंतरराष्ट्रीय जल कानून, मानवाधिकार और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की। पाकिस्तान से जुड़े विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि नदी और जल प्रबंधन से जुड़े फैसलों का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। चर्चा में पीने के पानी, कृषि, आजीविका, पर्यावरण और कमजोर समुदायों की स्थिति जैसे मुद्दे उठाए गए।
'पानी को राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जा सकता'
इस कार्यक्रम में पाकिस्तानी मूल के कानूनी विशेषज्ञ हरमयन मुजाहिद ने जल असुरक्षा को मानवाधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि पानी को राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने भारत से सिंधु जल संधि बहाल करने की मांग की। वहीं, पाकिस्तानी एक्सपर्ट और हाइड्रो-जस्टिस स्टूडेंट रिसर्च एंड पॉलिसी फेलोशिप की संस्थापक रशीदा अब्बास ने कहा कि नदियों को केवल देशों के बीच विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इनके फैसलों का असर सीधे लोगों और समुदायों पर पड़ता है।
भारत और पाकिस्तान का क्या है रुख ?
पाकिस्तान लगातार यह तर्क देता रहा है कि Indus Waters Treaty उसके लिए पानी, कृषि और अर्थव्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण समझौता है। दूसरी ओर, भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर अपने रुख को सीमा-पार आतंकवाद के मुद्दे से जोड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी विशेषज्ञों ने Permanent Court of Arbitration (PCA) से जुड़ी कार्यवाही का भी हवाला दिया और दावा किया कि संधि पर भारत के फैसले के बावजूद समझौता प्रभावी माना जा रहा है। हालांकि, भारत इस मध्यस्थता प्रक्रिया की वैधता को स्वीकार नहीं करता और अपने रुख पर कायम है। ऐसे में UNHRC के कार्यक्रम में उठी मांग फिलहाल पाकिस्तान और उससे जुड़े विशेषज्ञों का पक्ष है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि संधि की स्थिति पर भारत का रुख बदल गया है।




