काठमांडू, 12 सितंबर 2026 : नेपाल ने एक बार फिर अपनी संतुलित विदेश नीति का संकेत दिया है। भारत और चीन जैसे दो बड़े पड़ोसियों के बीच फंसे नेपाल ने हालिया प्राकृतिक आपदा के दौरान ऐसा कदम उठाया, जिससे वह किसी भी देश की कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बनने से बच गया। बालेन सरकार ने शुरुआत में भारत और चीन की विदेशी खोज एवं बचाव (SAR) टीमों की तैनाती को नियंत्रित रखा और आपदा राहत को राजनीतिक प्रभाव की होड़ से अलग रखने की कोशिश की। नेपाल के इस फैसले के पीछे 2015 का विनाशकारी भूकंप एक बड़ा सबक माना जा रहा है। उस दौरान भारत, चीन, अमेरिका समेत कई देशों ने बड़े पैमाने पर राहत और बचाव दल नेपाल भेजे थे। हालांकि, अलग-अलग देशों की सक्रियता के बीच राहत कार्यों के समन्वय और प्रबंधन को लेकर नेपाल के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां खड़ी हुई थीं।
2015 से नेपाल ने लिया बड़ा सबक
दक्षिण एशिया की राजनीति पर नजर रखने वाले अमेरिकी विशेषज्ञ डेरेक जे. ग्रॉसमैन ने अपने एक विश्लेषण में नेपाल की मौजूदा रणनीति पर चर्चा की है। उनके मुताबिक 2015 की आपदा के अनुभव ने काठमांडू को यह समझने में मदद की कि बड़े पैमाने पर विदेशी बचाव दलों की मौजूदगी कभी-कभी राहत कार्यों के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को भी जन्म दे सकती है। 2015 में भारत ने ऑपरेशन मैत्री के तहत सैन्य विमान, हेलीकॉप्टर, मेडिकल टीम और बचावकर्मियों को नेपाल भेजा था। वहीं चीन ने भी बड़े पैमाने पर विदेशी मानवीय राहत अभियान चलाया था। मानवीय मदद के साथ दोनों देशों की सक्रियता ने नेपाल के सामने राहत कार्यों के बेहतर समन्वय की चुनौती खड़ी कर दी थी। इस बार काठमांडू ने उसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए ज्यादा सावधानी बरती।
नेपाल ने भारत-चीन की रेस्क्यू रेस को कैसे रोका ?
हालिया आपदा के शुरुआती दौर में नेपाल ने विदेशी SAR टीमों की तैनाती को सीमित और नियंत्रित रखने की नीति अपनाई। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि राहत और बचाव अभियान किसी देश की राजनीतिक या रणनीतिक मौजूदगी की प्रतिस्पर्धा में न बदल जाए। बाद में भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के टनल-रेस्क्यू विशेषज्ञ नेपाली सेना के साथ मिलकर बचाव अभियान में शामिल हुए। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात की SAR टीमें भी राहत प्रयासों का हिस्सा बनीं। इस तरह नेपाल ने किसी एक देश को प्राथमिकता देने के बजाय जरूरत के मुताबिक अलग-अलग देशों की विशेषज्ञता का इस्तेमाल किया।
आपदा के बीच भी जारी रहा रेस्क्यू ऑपरेशन
आपदा के करीब दो सप्ताह बाद भी नेपाल में राहत और बचाव अभियान पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। खासतौर पर पनबिजली परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों के जिंदा होने की संभावना के चलते बचाव अभियान जारी रखा गया। सरकार के मुताबिक, सितंबर के पहले सप्ताह में भी कई लोगों को जिंदा बचाया गया। इनमें नेपाली मजदूरों के साथ एक चीनी नागरिक भी शामिल था। इससे सुरंगों में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन की अहमियत और बढ़ गई।
भारत और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश
नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी हैं। एक तरफ भारत के साथ उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते हैं, तो दूसरी तरफ चीन के साथ व्यापार और रणनीतिक संबंध लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में किसी प्राकृतिक आपदा के दौरान अगर एक देश की मौजूदगी दूसरे देश की तुलना में ज्यादा दिखाई देती, तो इसका असर नेपाल की विदेश नीति पर भी पड़ सकता था। यही वजह है कि काठमांडू ने इस बार राहत अभियान को 'कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा' से दूर रखने की कोशिश की।
बालेन सरकार की रणनीति कितनी कामयाब ?
नेपाल का मौजूदा रुख यह संकेत देता है कि काठमांडू भारत और चीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देना चाहता है। राहत और बचाव अभियानों में दोनों देशों की विशेषज्ञता का इस्तेमाल करना, लेकिन शुरुआत में किसी एक देश को हावी नहीं होने देना, इसी संतुलन का हिस्सा माना जा सकता है। नेपाल की चुनौती सिर्फ प्राकृतिक आपदा से निपटना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि मानवीय संकट उसके लिए किसी बड़ी शक्ति की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच न बन जाए। यही वजह है कि नेपाल का मौजूदा कदम उसकी आपदा प्रबंधन नीति के साथ-साथ उसकी संतुलित कूटनीति का भी उदाहरण बनकर सामने आया है।




