लंदन, 7 सितंबर, 2026 : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने ब्रिटेन के लंदन में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। मोहन भागवत ने लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, हिंदुत्व और संघ के भविष्य के विजन को लेकर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की अवधारणा को केवल किसी देश की राजनीतिक या प्रशासनिक सीमा तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। लंदन में आयोजित Celebration of Oneness कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू राष्ट्र का विचार विविधता को खत्म करने की बात नहीं करता। उनके मुताबिक भारत की पहचान अलग-अलग परंपराओं, विचारों और धार्मिक मान्यताओं के साथ बनी है और एकता के लिए एकरूपता बहुत जरूरी नहीं है।

हिंदू राष्ट्र का मतलब क्या बताया ?

मोहन भागवत ने कहा कि 'हिंदू' शब्द को केवल किसी खास धार्मिक पद्धति या पूजा-पद्धति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार हिंदू विचार में अलग-अलग रास्तों और परंपराओं के लिए जगह है। उन्होंने विविधता को स्वाभाविक और एकता को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा का उद्देश्य सांस्कृतिक एकरूपता थोपना नहीं है। मोहन भागवत के मुताबिक विदेशों में रहने वाले लोग भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रह सकते हैं, लेकिन उनकी निष्ठा और जिम्मेदारी उस देश के प्रति होती है जहां वे रहते हैं।

RSS के 20 साल के विजन का क्या है प्लान ?

RSS प्रमुख ने इस बीच संगठन के सामने हिंदू समाज को संगठित करने के लक्ष्य का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस काम को अनिश्चित समय तक आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए आने वाले करीब 20 वर्षों का विजन सामने रखा गया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी अगली पीढ़ियों के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रही है। उनका जोर इस बात पर रहा कि आने वाली पीढ़ियों के साथ संगठन और समाज निर्माण का काम लगातार आगे बढ़ाया जाए।

RSS खुद को देश का 'ठेकेदार' नहीं मानता

मोहन भागवत ने यह भी कहा कि RSS देश के विकास का अकेला जिम्मेदार संगठन होने का दावा नहीं करता। संघ की भूमिका ऐसे सामाजिक वातावरण के निर्माण की है, जिसमें समाज खुद देश को आगे ले जाने की क्षमता विकसित करे। उन्होंने सेवा, शिक्षा, पुनर्निर्माण और सामाजिक कार्यों को संघ की गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनके मुताबिक जहां समाज को जरूरत हो, वहां काम किया जाना चाहिए और इसका श्रेय किसे मिलता है, इसकी चिंता कभी नहीं होनी चाहिए।

'एकता के लिए एकरूपता जरूरी नहीं'

भागवत के लंदन संबोधन में Unity in Diversity का विचार ही प्रमुख रहा। उन्होंने हिंदुत्व को एकता की भावना से जोड़ते हुए कहा कि समाज में मौजूद विविधताओं को स्वीकार करते हुए भी एकता कायम रखी जा सकती है। उनके मुताबिक यही सोच हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के केंद्र में है और इसका उद्देश्य दुनिया के सामने विविधता के साथ एकता की अवधारणा को रखना है।