.मुजफ्फरनगर, 8 सितंबर। मुजफ्फरनगर की अदालत ने दहेज हत्या के एक गंभीर मामले में दोषी नदीम को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने मामले की गंभीरता और अपराध की परिस्थितियों को देखते हुए फांसी की सजा सुनाने का फैसला किया। इस आदेश के बाद जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। अपने सख्त और चर्चित फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले जज दिवाकर ने आदेश में न्यायिक स्वतंत्रता और अपने सिद्धांतों को लेकर भी स्पष्ट टिप्पणी की है।

दहेज हत्या के मामले में सुनाई गई फांसी

अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद नदीम को दहेज हत्या का दोषी माना और उसे मृत्युदंड दिया। फैसला गंभीर आपराधिक मामलों में अदालत के कठोर रुख को दर्शाता है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट से मिली मृत्युदंड की सजा का अंतिम क्रियान्वयन उच्च न्यायालय की पुष्टि के बाद ही संभव होता है।

23वीं बार मृत्युदंड की चर्चा

जज रवि कुमार दिवाकर के कई सख्त फैसले पहले भी चर्चा में रहे हैं। हालिया मामले में नदीम को सुनाई गई सजा को उनकी 23वीं मृत्युदंड की सजा बताया जा रहा है। यह आंकड़ा सार्वजनिक चर्चाओं में सामने आया है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड से ही मानी जानी चाहिए।

‘डरपोक जज कहलाने से बेहतर मरना’

फैसले में जज दिवाकर की एक टिप्पणी विशेष रूप से चर्चा में है। उन्होंने कहा कि वह “डरपोक जज कहलाने से बेहतर मरना पसंद करेंगे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वह अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं, तब तक न्यायिक सेवा में बने रहेंगे। यदि कभी उन्हें सिद्धांतों से समझौता करने की स्थिति का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने पद छोड़ना बेहतर बताया।

कथित माफिया दबाव का भी जिक्र

जज ने अपने आदेश में कथित दबाव का उल्लेख करते हुए बताया कि पश्चिमी क्षेत्र के एक माफिया या गैंगस्टर की ओर से संदेश पहुंचाए जाने की बात सामने आई थी। कथित संदेश में कहा गया था कि फिलहाल उनके न्यायालय से केवल कुछ पत्रावलियां हटवाई गई हैं और संबंधित मामलों में आगे बढ़ने पर उनका जिले से बाहर तबादला कराया जा सकता है।

कानून और विवेक से फैसला लेने पर जोर

जज दिवाकर ने कहा कि न्यायिक कुर्सी पर रहते हुए कानून और अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेना उनका अधिकार और दायित्व है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी दबाव के कारण वह अपने न्यायिक कर्तव्यों और सिद्धांतों से समझौता नहीं करेंगे।

दहेज हत्या में मृत्युदंड और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर की गई इन टिप्पणियों ने इस फैसले को खासा चर्चित बना दिया है।