नई दिल्ली, 18 सितंबर। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेजी से बढ़ती क्षमताओं के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या आने वाले 10 वर्षों में AI मानवता के लिए अस्तित्वगत खतरा बन सकता है। हाल की चेतावनियों में कुछ AI सुरक्षा शोधकर्ताओं ने बेहद गंभीर संभावनाएं जताई हैं, लेकिन 2036 तक इंसानों के खत्म होने की बात कोई निश्चित वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं है। यह अलग-अलग विशेषज्ञों के जोखिम आकलनों पर आधारित बहस है।
10 साल वाली चेतावनी कहां से आई?
पूर्व Google DeepMind शोधकर्ता बिलाल चुगताई और Anthropic से जुड़े शोधकर्ताओं ने उन्नत AI के नियंत्रण से बाहर जाने की संभावनाओं पर चिंता जताई है। Anthropic के alignment researcher इवान ह्यूबिंगर ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें अगले दशक में AI से मानव-विनाशकारी परिणाम की 10% से अधिक संभावना का व्यक्तिगत आकलन है। यह उनका जोखिम अनुमान है, स्थापित तथ्य नहीं।
AI से किस तरह का खतरा संभव है?
विशेषज्ञों की चिंता केवल काल्पनिक ‘रोबोट विद्रोह’ तक सीमित नहीं है। ज्यादा स्वायत्त AI एजेंट, साइबर हमले, संवेदनशील डिजिटल सिस्टम तक पहुंच, धोखे या निगरानी से जुड़े जोखिम भी चर्चा में हैं। International AI Safety Report के अनुसार AI की गणित, कोडिंग और स्वायत्त काम करने की क्षमता बढ़ रही है, जिससे साइबर और जैविक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में नए जोखिम पैदा हो रहे हैं।
क्या वैज्ञानिकों में इस पर सहमति है?
नहीं। 2,778 AI शोधकर्ताओं के सर्वे में 38% से 51% प्रतिभागियों ने उन्नत AI से मानव-विलुप्ति जैसे परिणाम की कम से कम 10% संभावना मानी। साथ ही सर्वे में यह भी सामने आया कि शोधकर्ताओं के बीच AI के भविष्य को लेकर व्यापक अनिश्चितता बनी हुई है।
RAND रिपोर्ट क्या कहती है?
RAND के 2025 विश्लेषण के अनुसार AI से मानव-विलुप्ति का जोखिम चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट ने कहा कि ऐसे परिदृश्य के लिए AI को महत्वपूर्ण साइबर-भौतिक प्रणालियों से जुड़ने, मानव रखरखाव के बिना काम करने और मनुष्यों को मात देने जैसी कई क्षमताओं की जरूरत होगी।
2036 का असली मतलब क्या समझें?
2036 को किसी तय ‘डूम्सडे डेट’ की तरह देखना सही नहीं होगा। असली मुद्दा यह है कि AI की क्षमताएं कितनी तेजी से बढ़ती हैं और सुरक्षा, परीक्षण, निगरानी तथा नियंत्रण की व्यवस्था उनके साथ कितनी तेजी से विकसित होती है। अभी उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य भविष्य को लेकर गंभीर सवाल तो उठाते हैं, लेकिन निश्चित निष्कर्ष नहीं देते।




