रांची, 30 अगस्त। बीजेपी प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस और राज्य सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने रांची में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान समेत आदिवासी आबादी, जमीन और अधिकारों से जुड़े कई मुद्दे उठाए। मरांडी ने आरोप लगाया कि आजादी के बाद से कांग्रेस ने आदिवासी समाज के साथ लगातार छल किया है।
आदिवासी आबादी घटने का आंकड़ा पेश किया
बाबूलाल मरांडी ने जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 1951 में झारखंड क्षेत्र में आदिवासियों की आबादी करीब 35.38 प्रतिशत थी, जो 2011 में घटकर 26.20 प्रतिशत रह गई। उन्होंने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि यदि यही स्थिति आगे भी जारी रही तो आदिवासी समाज के सामने आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
संथाल परगना के आंकड़ों का भी किया जिक्र
बीजेपी नेता ने संथाल परगना की स्थिति का उल्लेख करते हुए दावा किया कि 1951 में यहां आदिवासी आबादी करीब 44.67 प्रतिशत थी, जो 2011 में घटकर 28.1 प्रतिशत रह गई। उन्होंने कहा कि आबादी में इस बदलाव को गंभीरता से समझने और इसके कारणों पर चर्चा करने की जरूरत है।
बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठाया
मरांडी ने संथाल परगना के रास्ते कथित बांग्लादेशी घुसपैठ का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे आदिवासियों की जमीन और अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने राज्य सरकार पर वोट बैंक की राजनीति के कारण इस मुद्दे पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया।
आदिवासी महाजुटान पर भी साधा निशाना
रांची के मोरहाबादी मैदान में हुए आदिवासी एकता महाजुटान को लेकर भी बाबूलाल मरांडी ने सवाल उठाए। उन्होंने कांग्रेस और मिशनरियों पर आरोप लगाते हुए कहा कि भोले-भाले आदिवासियों पर रैली में शामिल होने के लिए दबाव बनाया गया। उन्होंने एक कथित ऑडियो का हवाला देते हुए दावा किया कि रैली में नहीं आने पर जुर्माना लगाने की बात कही गई थी। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
आदिवासी जमीन और अधिकारों की सुरक्षा की मांग
बाबूलाल मरांडी ने पाकुड़ की आदिवासी कल्याण समिति की ओर से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, निर्वाचन आयोग और मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि पत्र में आदिवासी जमीन पर कथित अवैध कब्जे और निर्माण से जुड़े मामलों का जिक्र किया गया है।
उन्होंने राज्य सरकार से आदिवासी जमीन और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की। साथ ही कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से देखने की जरूरत है।




