नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार विदेश दौरों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं कि इन यात्राओं से भारत को वास्तविक फायदा कितना हुआ। अब अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक विश्लेषण में मोदी सरकार की विदेश नीति और हाल के दौरों का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत अब किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर टैरिफ और रूस से तेल खरीद को लेकर दबाव बढ़ने के बाद भारत की विदेश नीति में आर्थिक और रणनीतिक संतुलन का पहलू और महत्वपूर्ण हो गया है। भारत ने व्यापार, ऊर्जा, रक्षा तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में कई देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है।

मोदी के विदेश दौरे कितने अहम ?

रिपोर्ट में अगस्त 2025 से अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीब 20 देशों की आधिकारिक यात्राओं का उल्लेख किया गया है। इन यात्राओं के दौरान भारत ने कई देशों के साथ व्यापार और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश की। इन दौरों का फोकस केवल द्विपक्षीय मुलाकातों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि Trade, Defence, Energy, AI और Technology जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने पर भी रहा है। भारत की मौजूदा कूटनीति का एक अहम हिस्सा यह है कि वैश्विक परिस्थितियां बदलने पर किसी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जाए।

रक्षा से लेकर AI तक साझेदारी पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान रक्षा तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऊर्जा सुरक्षा और छात्रों एवं युवाओं के लिए अवसर जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। भारत ने जर्मनी के साथ पनडुब्बी तकनीक, फ्रांस के साथ AI और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है। वहीं ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। भारत का लक्ष्य अपनी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ रक्षा और तकनीकी क्षमताओं को भी मजबूत करना है।

EU के साथ ट्रेड डील क्यों है महत्वपूर्ण ?

भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को भी इस नई आर्थिक कूटनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। इस तरह के समझौतों का उद्देश्य भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी बाजारों में अवसर बढ़ाना और विदेशी निवेश को आकर्षित करना है। इसके साथ ही भारत को अपने बाजार में भी कुछ आर्थिक रियायतें देनी पड़ सकती हैं। यही वजह है कि India-EU Trade Deal को आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

शिप बिल्डिंग और क्रिटिकल मिनरल्स पर भी नजर

भारत अब केवल पारंपरिक व्यापारिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहता। सरकार की प्राथमिकताओं में Critical Minerals, Shipbuilding, Artificial Intelligence और Energy Security भी शामिल हैं। भारत ने 2047 तक दुनिया के प्रमुख शिपबिल्डिंग देशों में शामिल होने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ सहयोग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।वहीं, ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत अलग-अलग देशों के साथ दीर्घकालिक साझेदारी पर जोर दे रहा है।

ट्रंप की नीतियों के बीच भारत ने बनाया संतुलन

भारत और अमेरिका के रिश्ते लंबे समय से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। हालांकि, टैरिफ, रूस से तेल खरीद और अन्य मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद भी सामने आए हैं। ऐसे समय में भारत की कोशिश यह दिखाई देती है कि अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए फ्रांस, जापान, कनाडा, रूस, यूरोप और अन्य देशों के साथ भी अपने रिश्तों को मजबूत किया जाए। इसे भारत की Multi-Alignment Strategy के तौर पर देखा जा सकता है।

क्या भारत अमेरिका पर निर्भरता घटा रहा है ?

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत पूरी तरह अमेरिका से दूरी बनाने की नीति पर नहीं चल रहा है। बल्कि नई रणनीति का उद्देश्य यह है कि भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए कई वैश्विक साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखे। इससे भारत को वैश्विक तनाव, व्यापारिक विवाद या ऊर्जा संकट जैसी परिस्थितियों में विकल्प मिल सकते हैं।

विदेश दौरे अब ‘इकोनॉमिक डिप्लोमेसी’ का हिस्सा

प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों को अब केवल राजनयिक मुलाकातों के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इन यात्राओं में Economic Diplomacy का हिस्सा लगातार बढ़ा है। रक्षा तकनीक, निवेश, व्यापार, ऊर्जा, AI, शिक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों में समझौते भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की कोशिश का हिस्सा हैं। बदलती विश्व व्यवस्था के बीच भारत की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। अमेरिका समेत सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों को लेकर राजनीतिक बहस जारी रह सकती है, लेकिन भारत की विदेश नीति में आर्थिक हित, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय साझेदारी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में इन समझौतों का वास्तविक आर्थिक असर ही इस रणनीति की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना होगा।