चेन्नई: तमिलनाडु में पुरातात्विक खुदाई के दौरान एक ऐसी प्राचीन कटोरी मिली है, जिसने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है। सेलम के पास मेट्टूर बांध के जलमग्न क्षेत्र तेलुंगनूर में मिली इस कटोरी पर पांच रहस्यमयी चिह्न अंकित हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह खोज प्राचीन लेखन प्रणाली और तमिल-ब्राह्मी लिपि के विकास को समझने में महत्वपूर्ण सुराग दे सकती है।
तमिलनाडु पुरातत्व विभाग की इस खुदाई में काले और लाल रंग की एक साबुत कटोरी के साथ लोहे के हथियार, तांबे की वस्तुएं और एक संभावित स्टील की तलवार भी मिली है। इसके अलावा, इस स्थल से लौह युग के मानव कंकाल और दफनाने की अलग-अलग प्रथाओं के प्रमाण भी सामने आए हैं।
3,200 साल पुरानी कटोरी पर मिले पांच रहस्यमयी चिह्न
तेलुंगनूर में मिली काले और लाल रंग की कटोरी पर बाएं से दाएं पांच ग्राफिती चिह्न बने हुए हैं। ग्राफिती चिह्न प्राचीन मिट्टी के बर्तनों या अन्य वस्तुओं पर उकेरे गए निशान होते हैं, जिनका इस्तेमाल पहचान, प्रतीक या संचार के लिए किया जाता रहा हो सकता है।
शोधकर्ताओं के लिए इस खोज की खास बात यह है कि एक दूसरी कटोरी पर भी यही पांच चिह्न मिले हैं, लेकिन उनका क्रम अलग है। इससे इन निशानों के संभावित अर्थ और उनके इस्तेमाल को लेकर नए सवाल उठे हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये चिह्न छठी शताब्दी ईसा पूर्व में विकसित तमिल-ब्राह्मी लिपि के शुरुआती रूप से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि, इनका वास्तविक अर्थ और किसी व्यवस्थित लेखन प्रणाली से संबंध अभी प्रमाणित नहीं हुआ है।
सिंधु घाटी सभ्यता से क्या है संबंध?
तेलुंगनूर और पास का मांगाडू लौह युग के दो महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल हैं। इनका कालखंड लगभग 1600 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। यह समय सिंधु घाटी सभ्यता के अंतिम चरण के आसपास का है।
तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के सलाहकार के. राजन के अनुसार, 1960 के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को चेंगलपट्टू के पास सानूर में अलग-अलग क्रम में तीन ग्राफिती चिह्न मिले थे। अब तेलुंगनूर में पांच-पांच चिह्नों की दो अलग-अलग श्रृंखलाएं मिलने से इस विषय पर शोध की संभावनाएं बढ़ी हैं।
तमिलनाडु के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से अब तक ग्राफिती चिह्नों वाले मिट्टी के बर्तनों के लगभग 16,000 टुकड़े मिलने की जानकारी दी गई है। इनमें से कई निशानों की तुलना सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों पर मिले चिह्नों से की गई है।
एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, कोडुमनाल, कीलाडी, थुलुक्कड़पट्टी और किलनामंडी जैसे तमिलनाडु के स्थलों तथा सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों से मिले कुछ चिह्नों में 90 प्रतिशत तक समानता देखी गई है। हालांकि, चिह्नों की समानता अपने आप में दोनों सभ्यताओं के बीच सीधे संबंध या एक ही लिपि के इस्तेमाल का निर्णायक प्रमाण नहीं है।
1.9 मीटर लंबा लोहे का भाला भी मिला
तेलुंगनूर में खुदाई के दौरान केवल मिट्टी के बर्तन ही नहीं, बल्कि कई प्राचीन हथियार भी मिले हैं। उत्खनन निदेशक एस. परनथामन के अनुसार, यहां से लगभग 1.9 मीटर लंबा लोहे का भाला बरामद हुआ है।
इसके अलावा, पुरातत्वविदों को तीरों के अग्रभाग, कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटार, चाकू और लोहे की कीलें भी मिली हैं। तांबे की वस्तुएं भी इस स्थल से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री का हिस्सा हैं।
विशेषज्ञों को यहां एक प्राचीन स्टील की तलवार मिलने का भी संदेह है। इस स्थल से पहले मिली एक स्टील की तलवार की कार्बन डेटिंग लगभग 1200 ईसा पूर्व बताई गई थी। इसे दुनिया की सबसे पुरानी स्टील की तलवारों में से एक माना जाता है।
हालांकि, नई मिली वस्तुओं की धातु संरचना और उनकी सही उम्र की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण होगा।
लौह युग के दो मानव कंकाल भी मिले
खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को लौह युग के दो मानव कंकाल भी मिले हैं। इन अवशेषों से उस समय के लोगों की जीवनशैली, स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था को समझने में मदद मिल सकती है।
इस स्थल की एक अन्य खासियत यहां दफनाने की चार अलग-अलग पद्धतियों का मिलना है। इनमें शामिल हैं:
- पिट बुरियल: जमीन में गड्ढा खोदकर शव को दफनाना।
- सिस्ट बुरियल: पत्थरों से बने कक्ष या पेटिका में शव अथवा अवशेष रखना।
- अर्न बुरियल: अस्थियों या अन्य अवशेषों को मिट्टी के बड़े पात्र में रखना।
- सरकोफैगस बुरियल: शव को विशेष शव-मंजूषा में रखना।
एक ही पुरातात्विक स्थल पर दफनाने की इन चार पद्धतियों के प्रमाण मिलने से वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता का संकेत मिलता है।
प्राचीन तमिल समाज को समझने में मिलेगी मदद?
उत्खनन निदेशक एस. परनथामन के मुताबिक, एक ही स्थान पर दफनाने की विभिन्न पद्धतियों का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि यहां विविध सामाजिक परंपराएं प्रचलित रही होंगी। पुरातात्विक अवशेष यह समझने में मदद कर सकते हैं कि यह बस्ती शुरुआती लौह युग से लेकर बाद के चरणों तक किस तरह विकसित हुई।
कटोरी पर अंकित पांच चिह्न, लोहे के हथियार, संभावित स्टील की तलवार और मानव कंकाल मिलकर इस स्थल को शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
हालांकि, इन चिह्नों को किसी विकसित लिपि का प्रमाण मानने से पहले उनके स्वरूप, दूसरे स्थलों पर मिले निशानों से समानता और पुरातात्विक संदर्भों का विस्तृत अध्ययन जरूरी है। यदि आगे के शोध से इनके बीच स्पष्ट संबंध स्थापित होता है, तो यह दक्षिण भारत की प्राचीन लेखन परंपराओं और सिंधु घाटी सभ्यता के चिह्नों पर चल रही बहस को नई दिशा दे सकता है।
फिलहाल, तेलुंगनूर की यह खोज प्राचीन दक्षिण भारतीय समाज, उसकी तकनीकी क्षमताओं और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।




