नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026
भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर विवाद लगातार चर्चा में है। इसी बीच पाकिस्तानी पॉलिसी एनालिस्ट और रिसर्चर सोहा निसार ने अपने एक लेख में पाकिस्तान की खेती, बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि देश की बड़ी हिस्सेदारी की खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है और पानी के प्रवाह में बड़े बदलाव का असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इस तरह देश की 80 प्रतिशत खेती पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान में क्यों बढ़ी चिंता?
भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में सिंधु जल संधि हुई थी। इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच व्यवस्था तय की गई थी।पाकिस्तानी एक्सपर्ट सोहा निसार ने अपने लेख में सिंधु नदी प्रणाली पर पाकिस्तान की निर्भरता का उल्लेख करते हुए कहा कि पानी की उपलब्धता में गंभीर कमी आने पर देश की कृषि और ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हालांकि, 80 फीसदी खेती खत्म होने का दावा एक्सपर्ट के आकलन के रूप में है, इसे किसी आधिकारिक सरकारी अनुमान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
पाकिस्तान की खेती पर कितना असर पड़ सकता है ?
सोहा निसार के मुताबिक, पाकिस्तान की बड़ी मात्रा में खेती सिंधु नदी प्रणाली से मिलने वाले पानी पर निर्भर है। ऐसे में पानी की आपूर्ति प्रभावित होने पर कृषि क्षेत्र के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो सकती है।पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए सिंचाई के पानी में कमी का असर किसानों के साथ-साथ खाद्य आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
बिजली उत्पादन को लेकर भी चिंता
पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने पानी के संकट का असर बिजली उत्पादन पर पड़ने की आशंका भी जताई है। उनका कहना है कि देश की ऊर्जा व्यवस्था का एक हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी पनबिजली परियोजनाओं पर भी निर्भर है। अगर नदियों के बहाव में लंबे समय तक बदलाव आता है, तो हाइड्रो पावर उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे पाकिस्तान की बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका है और पनबिजली परियोजना का काम रुक सकता है, जिससे जनजीवन प्रभावित होगा।
सिंधु जल संधि में क्या हुआ था समझौता ?
वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी। इस समझौते में पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज का पानी मुख्य रूप से भारत के लिए और पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया था। यह समझौता भारत-पाकिस्तान के बीच कई युद्धों के बावजूद लंबे समय तक कायम रहा।
पाकिस्तान को एक्सपर्ट ने क्या सलाह दी ?
सोहा निसार ने पाकिस्तान को केवल भारत पर आरोप लगाने के बजाय अपने घरेलू जल प्रबंधन को मजबूत करने की सलाह दी। उनके मुताबिक, पाकिस्तान को पानी के भंडारण की क्षमता बढ़ाने, जल प्रवाह का बेहतर रिकॉर्ड रखने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बातचीत करने की जरूरत है। उन्होंने विश्व बैंक के साथ संवाद बनाए रखने और पानी से जुड़े आंकड़ों को व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने पर भी जोर दिया।
भारत-पाकिस्तान के बीच पानी बना बड़ा मुद्दा
सिंधु जल संधि लंबे समय से दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दा रही है। पानी, सीमा और सुरक्षा से जुड़े विवादों के बीच इस समझौते को लेकर दोनों देशों के रुख में मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान से सामने आया यह विश्लेषण बताता है कि वहां कृषि, बिजली और जल सुरक्षा को लेकर सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भरता को लेकर चिंता बनी हुई है।




