नई दिल्ली/जिनेवा, 16 सितंबर 2026 : भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंच गया है। हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) ने 31 अगस्त 2026 को संधि की स्थिति और जम्मू-कश्मीर में रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े अंतरिम उपायों पर आदेश जारी किया था। भारत ने इस प्रक्रिया और उसके फैसले को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि जिस Court of Arbitration ने आदेश दिया, उसे भारत ने कभी मान्यता नहीं दी और उसके पास भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार क्षेत्र नहीं है। नई दिल्ली ने यह दोहराया है कि सिंधु जल संधि को अप्रैल 2025 से 'abeyance' में रखने का उसका फैसला बरकरार है।
1960 में हुई थी सिंधु जल संधि
भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। समझौते में सिंधु नदी प्रणाली के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और दायित्व तय किए गए हैं। विवादों के समाधान के लिए इसमें स्थायी सिंधु आयोग, Neutral Expert और कुछ परिस्थितियों में Court of Arbitration जैसी व्यवस्थाएं भी निर्धारित हैं। मौजूदा विवाद में पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और संधि की व्याख्या को लेकर आपत्ति जताई है। PCA की कार्यवाही में Ratle Hydro-Electric Plant समेत पश्चिमी नदियों पर भारत की परियोजनाओं से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
हेग की अदालत के आदेश पर भारत ने क्या कहा ?
31 अगस्त के आदेश के बाद भारत ने कहा कि वह इस मध्यस्थता संस्था को वैध नहीं मानता। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने न तो इस निकाय की स्थापना को स्वीकार किया है और न ही इसकी कार्यवाही में हिस्सा लिया है। भारत का कहना है कि इसके आदेशों का देश की परियोजनाओं से जुड़े संप्रभु फैसलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह International Court of Justice (ICJ) का फैसला नहीं है। मामला Permanent Court of Arbitration के तहत गठित Court of Arbitration से जुड़ा है।
अब UNHRC में उठा सिंधु जल संधि का मुद्दा
इसी विवाद के बीच जिनेवा में चल रहे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63
वें सत्र में एक भारतीय NGO ने सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग उठाई है। UNHRC का यह सत्र 7 सितंबर से 7 अक्टूबर 2026 तक चल रहा है। IANS के मुताबिक, NGO ने पानी और स्वच्छता तक पहुंच को मानवाधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि बदलती जल-सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए 1960 की संधि की आधुनिक मानवाधिकार दृष्टिकोण से समीक्षा की जानी चाहिए। हालांकि, यह किसी UNHRC के बाध्यकारी फैसले के बराबर नहीं है। यह एक NGO द्वारा मानवाधिकार परिषद के सत्र में उठाया गया मुद्दा है।
पाकिस्तान की जल सुरक्षा पर क्यों बढ़ी चिंता ?
सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की कृषि और जल व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत और पाकिस्तान के बीच संधि के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां माना गया है, जबकि भारत को इन नदियों पर संधि में निर्धारित सीमाओं के भीतर कुछ उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति है। भारत द्वारा संधि को abeyance में रखने और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग रुख के कारण पाकिस्तान में जल उपलब्धता और कृषि पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ी है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान में तत्काल सूखा पड़ने वाला है।
क्या सिंधु जल संधि फिर बहाल होगी ?
फिलहाल भारत का आधिकारिक रुख यही है कि संधि को abeyance में रखने का निर्णय जारी है। अगस्त 2026 में विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि भारत PCA के आदेश को स्वीकार नहीं करता और संधि पर उसका मौजूदा रुख कायम है। इसलिए आगे की स्थिति भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक संबंधों, संधि के तहत चल रही कानूनी प्रक्रियाओं और दोनों देशों के अगले फैसलों पर निर्भर करेगी। फिलहाल सिंधु जल संधि का विवाद कानूनी, कूटनीतिक और मानवाधिकार—तीनों मंचों पर चर्चा का विषय बन गया है।




