अजमेर (राजस्थान), 29 जुलाई 2026: राजस्थान के अजमेर जिले से करीब 16 किलोमीटर दूर तीर्थराज पुष्कर में स्थित 52 भैरव मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन इतिहास और रहस्यमयी कथाओं के कारण देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां दो अघोर साधकों की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने 52 भैरव स्वरूपों में दिव्य दर्शन दिए थे। तभी से यह मंदिर भैरव उपासकों और शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।

52 भैरव और 64 जोगणिया माताओं का अद्भुत संगम

मंदिर के पुजारी गर्व पराशर के अनुसार, जिस प्रकार पुष्कर में भगवान ब्रह्मा का विश्व प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, उसी प्रकार 52 भैरव मंदिर भी अपनी तरह का अनूठा धार्मिक स्थल माना जाता है। यहां एक साथ 52 भैरव और 64 जोगणिया माताओं की स्वयंभू प्रतिमाएं विराजमान हैं, जो इस मंदिर को विशेष बनाती हैं।

500 से 600 वर्ष पुराना है मंदिर

मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, यहां स्थापित सभी प्रतिमाएं स्वयं धरती से प्रकट हुई थीं। यह मंदिर लगभग 500 से 600 वर्ष पुराना माना जाता है। पराशर परिवार कई पीढ़ियों से यहां पूजा-अर्चना और मंदिर की सेवा करता आ रहा है।

अघोर साधना से प्रसन्न हुए भगवान शिव

लोक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में इस स्थान पर दो अघोरियों ने वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें 52 भैरव स्वरूपों में दिव्य दर्शन दिए। इसी घटना के बाद यह स्थान विशेष धार्मिक महत्व का केंद्र बन गया।

मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि विवाह में आ रही बाधाएं, संतान प्राप्ति की इच्छा और जीवन की अन्य मनोकामनाएं लेकर यहां आने वाले भक्तों की प्रार्थना भैरव बाबा अवश्य सुनते हैं। सच्ची श्रद्धा से पूजा करने पर इच्छाएं पूर्ण होने की मान्यता है।

नशे की लत से मुक्ति की अनोखी परंपरा

इस मंदिर की एक अनूठी परंपरा भी है। नशे की लत से परेशान लोग यहां शराब या अन्य नशीले पदार्थ भैरव बाबा को अर्पित कर उन्हें छोड़ने का संकल्प लेते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबा की कृपा से धीरे-धीरे व्यक्ति नशे की आदत से मुक्त होकर सकारात्मक जीवन की ओर बढ़ता है।

श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र

सावन सहित पूरे वर्ष देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। आध्यात्मिक वातावरण, प्राचीन परंपराएं और लोक आस्थाएं इस मंदिर को राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं।