नई दिल्ली/इस्लामाबाद, 19 सितंबर 2026 : भारत और पाकिस्तान के बीच Indus Waters Treaty (IWT) को लेकर तनाव लगातार बना हुआ है। 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच इस जल संधि पर कराची में हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई यह संधि सिंधु नदी प्रणाली के पानी के इस्तेमाल और दोनों देशों के बीच सहयोग के लिए एक ढांचा तय करती है। अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को abeyance यानी रोक/स्थगन की स्थिति में रखने का फैसला किया था। 2026 में भी इस मुद्दे पर भारत व पाकिस्तान के बीच मतभेद बने हुए हैं। हाल में भारत ने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा है कि संधि अभी भी abeyance में है और इस पर कोई समझौता या फिर बातचीत नहीं हो सकती है।

पाकिस्तान के लिए क्यों अहम है सिंधु नदी प्रणाली ?

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी निर्भर है। सिंधु और उसकी प्रमुख सहायक नदियां देश के बड़े हिस्से में सिंचाई, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान में पानी की उपलब्धता केवल खेती तक सीमित मुद्दा नहीं है। इसका असर खाद्य उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जलविद्युत और आम लोगों की आजीविका पर भी पड़ता है। इसी वजह से पाकिस्तान में Water Security को व्यापक आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाता है।पाकिस्तानी एक्सपर्ट यासिर खान ने Daily Sabah में लिखे एक लेख में भी सिंधु जल प्रणाली को पाकिस्तान की आर्थिक और पारिस्थितिक जीवन-रेखा बताया है। उनके अनुसार, पानी की सुरक्षा का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से है।

IWT में नदियों का बंटवारा कैसे हुआ ?

Indus Waters Treaty के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों को लेकर दोनों देशों के अधिकार और उपयोग तय किए गए हैं। विश्व बैंक के मुताबिक, सिंधु, झेलम और चिनाब को Western Rivers के रूप में पाकिस्तान के लिए आवंटित किया गया, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज Eastern Rivers हैं, जिनका उपयोग भारत के लिए निर्धारित किया गया। हालांकि, संधि दोनों देशों को दूसरे पक्ष को आवंटित नदियों पर कुछ विशेष उपयोग की अनुमति भी देती है। भारत को Western Rivers पर भी संधि में निर्धारित शर्तों के तहत कुछ कृषि, भंडारण और जलविद्युत उपयोग की अनुमति है। इसलिए IWT को केवल इस रूप में देखना सही नहीं होगा कि किसी देश को किसी नदी का पूरा पानी इस्तेमाल करने से पूरी तरह रोक दिया गया है।

पाकिस्तान के सामने असली चिंता क्या बताई जा रही है ?

पाकिस्तानी एक्सपर्ट यासिर खान के मुताबिक बहस सिर्फ इस सवाल पर नहीं होनी चाहिए कि भारत पाकिस्तान का पानी रोक सकता है या नहीं। उनके अनुसार, नदी का प्रवाह केवल किसी नल की तरह तुरंत बंद नहीं किया जा सकता। उनका जोर जल प्रवाह से जुड़े आंकड़ों और पूर्वानुमान पर है। पाकिस्तान सिंधु नदी प्रणाली में डाउनस्ट्रीम देश है। ऐसे में किसानों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण होता है कि नदी में पानी की उपलब्धता कब और कितनी होगी, ताकि वे बुवाई और सिंचाई की तैयारी कर सकें। इसी तरह बाढ़ और सूखे की स्थिति से निपटने के लिए भी नदी के प्रवाह और जल संबंधी आंकड़ों की जानकारी महत्वपूर्ण होती है।

Data Sharing पर भी पड़ सकता है असर

IWT में दोनों देशों के बीच नदी से जुड़े आंकड़ों और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए व्यवस्था मौजूद है। विश्व बैंक के अनुसार, संधि में Permanent Indus Commission के जरिए सहयोग और information exchange का प्रावधान है। इसके अलावा संधि में अलग-अलग तरह के मतभेद और विवाद सुलझाने के लिए भी प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं। यासिर खान का तर्क है कि यदि राजनीतिक तनाव के कारण ऐसे स्थापित तंत्र प्रभावित होते हैं, तो नदी के पानी की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है। इसका असर सीधे तौर पर किसानों और जल प्रबंधन व्यवस्था पर पड़ सकता है।

क्या भारत पाकिस्तान का पानी पूरी तरह रोक सकता है ?

यह सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में है। उपलब्ध संधि व्यवस्था के अनुसार, भारत और पाकिस्तान दोनों को अपने-अपने आवंटित जल संसाधनों के अलावा कुछ निर्धारित उपयोग के अधिकार दिए गए हैं। इसलिए “भारत ने पाकिस्तान का पूरा पानी रोक दिया” जैसी भाषा तथ्यात्मक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगी। वर्तमान विवाद मुख्य रूप से संधि की स्थिति, उसके तहत सहयोग और दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन से जुड़े अधिकारों को लेकर है। भारत ने 2025 में संधि को abeyance में रखने का फैसला किया था और 2026 में भी इस पर दोनों देशों के बीच मतभेद जारी हैं।

1960 में हुई थी संधि

सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को कराची में तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक ने इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। विश्व बैंक के मुताबिक यह समझौता करीब नौ साल चली बातचीत के बाद हुआ था और इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली के पानी के इस्तेमाल को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान करना था।

Water Security से जुड़ा बड़ा सवाल

भारत-पाकिस्तान के बीच राजनीतिक और सुरक्षा तनाव के बीच सिंधु जल संधि अब केवल पानी के बंटवारे का मुद्दा नहीं रह गई है। पाकिस्तान में इसे कृषि, खाद्य उत्पादन, जलविद्युत और आर्थिक स्थिरता से जोड़कर देखा जा रहा है। यही वजह है कि विशेषज्ञों के बीच Water Security, Food Security और National Security के बीच संबंध पर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, संधि की भविष्य की स्थिति और दोनों देशों के बीच जल सहयोग किस दिशा में जाएगा, यह आने वाले समय में होने वाले राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।