देवघर, 17 अगस्त। सावन के तीसरे सोमवार के दिन इस बार नाग पंचमी का भी विशेष संयोग बना है। 17 अगस्त 2026, सोमवार को एक ओर जहां भक्त भगवान शिव की आराधना और रुद्राभिषेक कर रहे हैं, वहीं नाग पंचमी के अवसर पर नाग देवता की पूजा भी की जा रही है। धार्मिक मान्यताओं में सावन सोमवार और नाग पंचमी के इस संयोग को विशेष महत्व दिया जाता है।
शिव पूजा के साथ नाग देवता की आराधना
सनातन परंपरा में नाग देवता का संबंध भगवान शिव से माना जाता है। भगवान शिव के गले में विराजमान नाग को शिव के प्रमुख प्रतीकों में शामिल किया जाता है। इसी मान्यता के चलते नाग पंचमी पर शिवलिंग के पूजन के साथ नाग देवता की आराधना भी की जाती है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. एन.के. बेरा के अनुसार, धार्मिक मान्यता में इस दिन भगवान शिव और नाग देवता को जल तथा कच्चा दूध अर्पित करने की परंपरा है। कुछ श्रद्धालु राहु-केतु और कालसर्प दोष से जुड़ी मान्यताओं के चलते भी विशेष पूजा करते हैं। हालांकि, इन ज्योतिषीय प्रभावों को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
नाग पंचमी पर ऐसे करें पूजा
सुबह स्नान करने के बाद व्रत या पूजा का संकल्प लिया जा सकता है। इसके बाद भगवान शिव का जलाभिषेक या रुद्राभिषेक करें। पूजा स्थल पर नाग देवता की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित कर जल, कच्चा दूध, रोली, चंदन, अक्षत, फूल और धान का लावा अर्पित किया जाता है।
पूजा के दौरान श्रद्धालु 'ॐ नमः शिवाय' का जाप कर सकते हैं। नाग देवता की आराधना के बाद खीर और पूरी का भोग लगाने की भी परंपरा है। अंत में आरती कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
शिव-नाग पूजा को क्यों माना जाता है खास?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव और नाग देवता का संबंध अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसलिए सावन सोमवार और नाग पंचमी का एक साथ पड़ना भक्तों के लिए विशेष अवसर माना जा रहा है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिरों में पहुंचकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं और नाग देवता की पूजा करते हैं।
कालसर्प दोष को लेकर क्या है मान्यता?
ज्योतिषीय मान्यताओं में नाग पंचमी को राहु-केतु और कालसर्प दोष से संबंधित पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, किसी भी दोष या उसके प्रभाव को लेकर व्यक्तिगत निष्कर्ष निकालने के बजाय योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है। पूजा-पाठ मुख्य रूप से श्रद्धा और धार्मिक आस्था का विषय है।




