नई दिल्ली, 26 सितंबर 2026। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की विपक्षी मुहिम के बीच पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने एक बड़ा बयान दे दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव नहीं ला सकता है। इस तरह पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने इस पूरी कवायद के कानूनी आधार पर ही सवाल उठा दिए हैं। रोहतगी का कहना है कि केवल चुनाव आयोग के भीतर मतभेद या प्रशासनिक फैसलों पर असहमति के आधार पर CEC के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई का संवैधानिक आधार नहीं बनता। मालूम हो कि विपक्षी दलों की ओर से ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में एक नया प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और दोनों सदनों में नोटिस दिए जाने की संभावना भी जताई गई है। मगर क्या इस तरह का कोई प्रस्ताव आएगा।
मुकुल रोहतगी ने क्या कहा ?
एक इंटरव्यू में मुकुल रोहतगी ने कहा कि मौजूदा आरोपों के आधार पर CEC के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का संवैधानिक आधार नहीं बनता है। उनके मुताबिक, आरोप अस्पष्ट हैं और उनमें ऐसा ठोस आधार दिखाई नहीं देता है, जिसे "proved misbehaviour" की श्रेणी में रखा जा सके। रोहतगी ने चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के बीच असहमति को भी लोकतांत्रिक संस्थाओं में होने वाली सामान्य प्रक्रिया के रूप में बताया है। उनका सीधा तर्क है कि किसी भी फैसले पर अलग-अलग राय होना अपने आप में गलत आचरण का प्रमाण नहीं है और इस आधर पर कोई कार्रवाई या मांग अनुचित है।
चुनाव आयोग में 14 बार मतभेद की रिपोर्ट
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में एक अखबार की रिपोर्ट है। इसमें साफ-साफ दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। इस रिपोर्ट में SIR यानी Special Intensive Revision से जुड़े मामलों सहित मतदाता सूची और चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठाए जाने की बात कही गई। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से यह कहा गया है कि SIR से जुड़े आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे।
क्या CEC को महाभियोग से हटाया जा सकता है ?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।इसका मतलब यह है कि केवल राजनीतिक असहमति या किसी फैसले से विवाद पैदा होना अपने आप में CEC को हटाने का संवैधानिक आधार नहीं बनता है। हटाने की प्रक्रिया में संसद की निर्धारित विशेष बहुमत वाली प्रक्रिया और कानून में तय चरण ही शामिल होते हैं। यहीं पर पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का मुख्य तर्क है कि मौजूदा विवाद में बताए जा रहे आंतरिक मतभेद या प्रशासनिक आपत्तियां अपने आप में "proved misbehaviour" साबित नहीं करतीं।
'CEC अकेले फैसले नहीं लेता'
पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने यह भी कहा कि CEC तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का एक सदस्य और उसका चेयरमैन होता है। चुनाव आयोग के फैसले निर्धारित व्यवस्था के तहत लिए जाते हैं और केवल इस आधार पर कि किसी निर्णय को लेकर सदस्यों में मतभेद हुआ, CEC पर गलत आचरण का आरोप स्थापित नहीं होता। उन्होंने न्यायपालिका का उदाहरण देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में भी कई बार जजों के बीच मतभेद होते हैं और अलग-अलग राय सामने आती हैं। किसी मुख्य न्यायाधीश के किसी मामले में अल्पमत में रहने का अर्थ अपने आप में गलत आचरण नहीं होता।
जस्टिस एचआर खन्ना के फैसले का दिया उदाहरण
पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने आपातकाल के दौरान ADM Jabalpur मामले का भी उदाहरण दिया। उन्होंने जस्टिस एचआर खन्ना के अल्पमत वाले फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायिक संस्थाओं में असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। बाद में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने 2017 में निजता के अधिकार के मामले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों को स्पष्ट किया। मुकुल रोहतगी का तर्क है कि किसी संस्था में अलग राय होना अपने आप में संस्था के प्रमुख के गलत आचरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता है।
विपक्ष की ओर से क्या कदम उठाया जा रहा है ?
विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, INDIA bloc के दलों के बीच इस मुद्दे पर संसद में प्रस्ताव लाने को लेकर चर्चा हुई है और प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है। यह विवाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के SIR exercise को लेकर विपक्ष की आपत्तियों के बीच तेज हुआ है। हालांकि, प्रस्ताव लाने की राजनीतिक तैयारी और किसी प्रस्ताव का संवैधानिक रूप से सफल होकर CEC को पद से हटाना-दो अलग-अलग चरण हैं। अंतिम परिणाम संसद की निर्धारित प्रक्रिया और संवैधानिक मानकों पर निर्भर करेगा।
क्या है पूरा विवाद ?
फिलहाल विवाद के तीन प्रमुख पहलू हैं—
- चुनाव आयोग के भीतर कथित तौर पर दर्ज की गई आपत्तियां।
- SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर विपक्ष की आपत्तियां।
- CEC को हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की विपक्षी तैयारी।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि संबंधित SIR आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से पारित हुए। ऐसे में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस के साथ-साथ इसका संवैधानिक और कानूनी आधार भी महत्वपूर्ण हो गया है।




