नई दिल्ली, 7 सितंबर 2026 : डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ मारपीट या फिर दुर्व्यवहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख काफी सख्त है। ताजा मामला महाराष्ट्र में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ कथित मारपीट का है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों द्वारा डॉक्टरों पर हमला किए जाने की घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में आरोपियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पालघर के एक अस्पताल में दही हांडी कार्यक्रम के दौरान घायल हुए गोविंदाओं के इलाज और डिस्चार्ज को लेकर हुए विवाद के बाद सामने आई। इस मामले में शिवसेना से जुड़े पदाधिकारियों सहित कुल 17 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की सुरक्षा पर क्या कहा ?

शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा है। शीर्ष कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि राजनीतिक प्रभाव रखने वाले लोग अगर अस्पतालों में पहुंचकर डॉक्टरों के साथ मारपीट या दबाव बनाने की कोशिश करते हैं तो उनके खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को अस्पतालों में होने वाली हिंसा और राजनीतिक दबाव के खिलाफ सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

पालघर के अस्पताल में कैसे शुरू हुआ विवाद ?

मामला दही हांडी कार्यक्रम के दौरान घायल हुए पांच गोविंदाओं से जुड़ा है। शनिवार रात मानव पिरामिड बनाने के दौरान घायल हुए लोगों को पालघर के रिलीफ अस्पताल में भर्ती कराया गया था।इनमें एक मरीज के सिर और रीढ़ में चोट की बात सामने आई थी। डॉक्टरों ने उसकी स्थिति को देखते हुए सीटी स्कैन समेत आगे की जांच की सलाह दी। इसी दौरान मरीजों के इलाज और उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज करने को लेकर विवाद बढ़ गया।

₹19,866 के बिल को लेकर क्या हुआ ?

अस्पताल की शिकायत के मुताबिक, पांच मरीजों के इलाज और जांच का कुल बिल करीब 19,866 रुपये आया था। इसमें से 10 हजार रुपये जमा किए गए थे। बाकी रकम और मरीजों को डिस्चार्ज कराने को लेकर अस्पताल कर्मचारियों और वहां पहुंचे लोगों के बीच विवाद होने का आरोप है। हालांकि, शिवसेना के पालघर जिला प्रमुख कुंदन सांखे ने अस्पताल की ओर से लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि वह घायल गोविंदाओं के इलाज और डिस्चार्ज को लेकर बातचीत करने अस्पताल पहुंचे थे।

अस्पताल में रात को क्या हुआ ?

अस्पताल की शिकायत के अनुसार, रविवार तड़के करीब 1:15 बजे 15 से 20 लोग कैजुअल्टी विभाग में पहुंचे। आरोप है कि इनमें शिवसेना के पालघर जिला प्रमुख कुंदन सांखे और शहर प्रमुख राहुल घराट भी शामिल थे। शिकायत में डॉक्टरों से सीटी स्कैन को लेकर बहस, महिला डॉक्टर से कथित गाली-गलौज और धमकी देने के आरोप लगाए गए हैं। अस्पताल प्रशासन ने एक कर्मचारी के साथ कथित मारपीट का आरोप भी लगाया है। उधर, अस्पताल का कहना है कि इस घटना का कुछ हिस्सा CCTV कैमरे में रिकॉर्ड हुआ है।

ICU तक पहुंचने का भी आरोप

अस्पताल प्रशासन ने शिकायत में आरोप लगाया है कि विवाद कैजुअल्टी तक सीमित नहीं रहा और कुछ लोग ICU तक भी पहुंच गए। वहां भर्ती मरीजों को डिस्चार्ज करने के लिए दबाव बनाने का भी आरोप लगाया गया है। अस्पताल प्रशासन ने इसे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बताया है। पुलिस CCTV फुटेज और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर मामले की जांच कर रही है।

17 लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ केस

पालघर पुलिस ने अस्पताल की शिकायत के आधार पर 17 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इनमें शिवसेना के पालघर जिला प्रमुख कुंदन बालकृष्ण सांखे, शहर प्रमुख राहुल रामदास घराट और स्थानीय विधायक राजेंद्र गावित के बेटे रोहित गावित समेत अन्य लोगों के नाम शामिल हैं। इस मामले में मारपीट, धमकी, अपमान, जबरन प्रवेश और गैरकानूनी तरीके से भीड़ जुटाने जैसी धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। डॉक्टरों और मेडिकल संस्थानों को हिंसा से सुरक्षा देने वाले महाराष्ट्र के संबंधित कानून की धाराएं भी लगाई गई हैं।

क्या आरोपियों की गिरफ्तारी हुई ?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, केस दर्ज होने के समय तक किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई थी। पुलिस पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही थी। वहीं, शिवसेना नेता कुंदन सांखे ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि अस्पताल पहुंचने का उद्देश्य घायल गोविंदाओं के इलाज और डिस्चार्ज को लेकर बात करना था। अब पुलिस की जांच और CCTV फुटेज से यह स्पष्ट होगा कि अस्पताल में वास्तव में क्या हुआ और मामले में किसकी क्या भूमिका थी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों अहम ?

डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर हमले के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ऐसे समय सामने आई है, जब अस्पतालों में हिंसा और बाहरी दबाव को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है। शीर्ष अदालत का संदेश साफ है कि राजनीतिक पहचान या प्रभाव डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ हिंसा के मामलों में ढाल नहीं बन सकता। हालांकि पालघर मामले में आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।