नई दिल्ली, 7 सितंबर 2026 : अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा व संरक्षण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति को अतिरिक्त छह महीने का समय देने से साफ इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने समिति को हर हाल में 30 नवंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। जबकि विशेषज्ञ समिति ने 28 फरवरी 2027 तक समय बढ़ाने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान समय सीमा को लेकर सख्त रुख अपनाया। समिति की पिछली समयसीमा 31 अगस्त को समाप्त हो चुकी थी।

CJI ने कहा- क्या मेरी सेवानिवृत्ति तक मामला टालना है ?

समिति की ओर से छह महीने के अतिरिक्त समय की मांग पर CJI सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि समिति की मांग ऐसी लगती है जैसे मामले को उनकी सेवानिवृत्ति तक टालने की कोशिश की जा रही हो। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अब समिति को और लंबा समय नहीं दिया जाएगा। पीठ ने जरूरत पड़ने पर समिति को दिन-रात काम करके तय समयसीमा में रिपोर्ट पूरी करने का निर्देश दिया।

समय पर काम नहीं हुआ तो समिति के पुनर्गठन की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि समिति 30 नवंबर तक अपना काम पूरा नहीं करती है तो उसके पुनर्गठन पर विचार किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अंतिम निष्कर्ष तैयार करने से पहले समिति को सभी संबंधित पक्षों के साथ प्रभावी सलाह-मशविरा करना होगा। इसमें राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों समेत अन्य प्रभावित पक्षों की राय भी शामिल करनी होगी।

अंतरिम रिपोर्ट पर भी कोर्ट की नजर

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि समिति की एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति को केवल अंतरिम रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अंतिम रिपोर्ट भी तय समय में पेश करनी होगी।हालांकि, अदालत ने जरूरत पड़ने पर समिति को महत्वपूर्ण मुद्दों पर अंतरिम रिपोर्ट उसके सामने रखने की अनुमति दी है। इससे अरावली से जुड़े जरूरी मामलों पर अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किए बिना अदालत विचार कर सकेगी।

किन लोगों से राय लेगी समिति ?

समिति को अरावली क्षेत्र की परिभाषा और सीमांकन से जुड़े वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और पारिस्थितिक पहलुओं का अध्ययन करना है। इसके लिए सरकारों, पर्यावरणविदों, संरक्षण विशेषज्ञों, गैर-लाभकारी संगठनों, खनन पट्टाधारकों, परियोजना से जुड़े पक्षों, किसानों, खदान मजदूरों और स्थानीय समुदायों से सुझाव लेने को कहा गया है। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि समिति के सामने रखे गए मुद्दों की सूची अंतिम नहीं है। जरूरत पड़ने पर वह अरावली पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की भी जांच कर सकती है।

जून में हुआ था समिति का गठन

सुप्रीम कोर्ट ने जून में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के महानिदेशक की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था। इस समिति को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और सीमांकन का व्यापक वैज्ञानिक आकलन करना था। समिति को पहले 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट देनी थी। मगर काम पूरा नहीं होने के बाद उसने 28 फरवरी 2027 तक छह महीने का अतिरिक्त समय मांगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।

100 मीटर वाली परिभाषा पर भी उठे थे सवाल

यह मामला सुप्रीम कोर्ट की स्वत: संज्ञान कार्यवाही से जुड़ा है। अदालत ने पिछले साल दिसंबर के अपने फैसले में अरावली पहाड़ियों की संशोधित परिभाषा से जुड़े निर्देशों पर रोक लगा दी थी। मुख्य चिंता यह थी कि संशोधित परिभाषा में केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को अरावली पहाड़ियों के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इससे पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण कई क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर होने की आशंका जताई गई थी। अब विशेषज्ञ समिति को 30 नवंबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। इस मामले की अगली सुनवाई दो दिसंबर 2026 को होगी।