नई दिल्ली, 16 सितंबर 2026 : समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर देश में बहस तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP-NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। इस बयान के बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने UCC को लेकर सरकार पर सवाल उठा दिए हैं। अरशद मदनी ने कहा कि देश संविधान के अनुसार चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे के आधार पर, यह स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने UCC को धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ते हुए अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि यह शरीयत के खिलाफ है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट में UCC के खिलाफ याचिका
अरशद मदनी के मुताबिक, जमीयत उलमा-ए-हिंद ने UCC के मुद्दे पर उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया है। उन्होंने बताया कि मामले में अब तक छह सुनवाई हो चुकी हैं और जमीयत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल समेत अन्य वकील अदालत में पेश हुए हैं। मदनी ने कहा कि जमीयत देश के संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन को बनाए रखने के पक्ष में है और उसे उम्मीद है कि अदालत से न्याय मिलेगा।
'शरीयत के खिलाफ कानून स्वीकार नहीं'
अरशद मदनी ने अपने बयान में कहा कि मुसलमान ऐसा कोई कानून स्वीकार नहीं कर सकते, जो उनके मुताबिक शरीयत के खिलाफ हो। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के लिए यह केवल व्यक्तिगत कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम पारिवारिक कानूनों का आधार कुरआन और हदीस हैं। मदनी ने सवाल उठाया कि यदि संविधान के प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को UCC से छूट दी जा सकती है, तो अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता का भी सम्मान क्यों नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 25 और 26 का दिया हवाला
मदनी ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लेख करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों की बात कही। उनका तर्क है कि जिन लोगों को किसी धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत अपने मामलों का संचालन नहीं करना है, उनके लिए पहले से वैकल्पिक नागरिक कानून मौजूद हैं। इसी आधार पर उन्होंने अनिवार्य UCC की जरूरत पर सवाल उठाया।
'एक देश, एक कानून' के नारे पर भी सवाल
जमीयत अध्यक्ष ने सरकार की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले 'एक देश, एक कानून' जैसे तर्कों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग राज्यों में कई मामलों को लेकर अलग कानून और विशेष प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने गौहत्या से जुड़े कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन मामलों में भी पूरे देश में एकरूपता नहीं है। मदनी ने यह भी कहा कि जमीयत की पुरानी मांग रही है कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देकर पूरे देश में उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
UCC पर बढ़ रही राजनीतिक बहस
अमित शाह के 21 NDA शासित राज्यों में 2029 से पहले UCC लागू करने के बयान के बाद इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ NDA सहयोगी दलों ने भी कहा है कि वे प्रस्तावित कानून के प्रावधानों और संबंधित हितधारकों से चर्चा के बाद अपना रुख तय करेंगे।फिलहाल UCC को लेकर केंद्र और विभिन्न राज्यों में प्रक्रिया तथा राजनीतिक चर्चा जारी है। उत्तराखंड में UCC लागू हो चुका है, जबकि अन्य राज्यों में इसकी स्थिति अलग-अलग है।




