नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026 : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब सिर्फ कंप्यूटर, डेटा और सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है। जैविक विज्ञान और मेडिकल रिसर्च में भी इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इससे नई दवाओं, उपचारों और जैविक शोध में संभावनाएं खुल रही हैं, लेकिन इसके साथ बायो-सिक्योरिटी को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। हाल में AI की मदद से वायरस के जेनेटिक स्वरूप में बदलाव से जुड़ी एक घटना सामने आने के बाद यह बहस तेज हुई है कि अगर ऐसी तकनीक का गलत इस्तेमाल किया गया तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। इसी तरह के एक मामले में AI कंपनी Anthropic ने संबंधित अकाउंट की पहचान कर उस पर रोक लगा दी थी। यह पूरा मामला सिर्फ किसी एक वायरस तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि अगर भविष्य में AI मॉडल, बायोलॉजिकल रिसर्च और ऑटोमेटेड लैबोरेटरी सिस्टम एक साथ काम करने लगें, तो क्या जैविक प्रयोग पहले की तुलना में ज्यादा आसान और तेज हो सकते हैं ?
AI ने डिजाइन किए नए बैक्टीरियोफेज
हालिया वैज्ञानिक शोध ने AI की जैविक डिजाइन क्षमता को लेकर चर्चा और तेज कर दी है। शोधकर्ताओं ने AI मॉडल की मदद से बैक्टीरियोफेज यानी ऐसे वायरस के जेनेटिक डिजाइन तैयार किए जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं। इस प्रक्रिया में AI मॉडल को बड़ी संख्या में प्राकृतिक जीनोम से मिले DNA सीक्वेंस के आधार पर प्रशिक्षित किया गया। इसके बाद मॉडल ने ऐसे नए जीनोमिक डिजाइन तैयार किए जो प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले फेज की सीधी कॉपी नहीं थे।शोधकर्ताओं ने इनमें से कुछ डिजाइन को प्रयोगशाला में तैयार कर उनकी क्षमता की जांच की। कुछ डिजाइन ऐसे पाए गए जो वास्तव में बैक्टीरिया को संक्रमित करने में सक्षम थे। इस शोध का उद्देश्य बीमारी फैलाना नहीं था। इसके पीछे एक संभावित मेडिकल उपयोग यह है कि भविष्य में ऐसे बैक्टीरियोफेज विकसित किए जा सकें जो एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया को निशाना बनाने में मदद करें।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के खिलाफ उम्मीद
दुनिया में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी AMR एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। साथ ही कई बैक्टीरिया पर पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम हो रहा है। ऐसी स्थिति में बैक्टीरियोफेज को एक संभावित वैकल्पिक उपचार के तौर पर देखा जाता है। ये वायरस खास तरह के बैक्टीरिया को संक्रमित कर उन्हें नष्ट कर सकते हैं। AI की मदद से भविष्य में ऐसे फेज डिजाइन करने की संभावना है जो किसी बैक्टीरिया को ज्यादा सटीक तरीके से पहचान सकें। अगर यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है तो गंभीर बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
लेकिन यही तकनीक बन सकती है चिंता की वजह
AI की जैविक डिजाइन क्षमता का दूसरा पहलू ज्यादा संवेदनशील है। जिस तकनीक से उपयोगी जैविक सिस्टम तैयार करने की उम्मीद है, उसके गलत इस्तेमाल को लेकर विशेषज्ञों में चिंता भी है।सबसे बड़ी आशंका यह है कि भविष्य में AI का इस्तेमाल ऐसे जैविक सिस्टम डिजाइन करने के लिए किया जा सकता है जिनका उद्देश्य नुकसान पहुंचाना हो। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आज AI आसानी से किसी को खतरनाक जैविक हथियार बनाने में सक्षम बना चुका है। मौजूदा शोध और तकनीक के बीच अभी भी कई वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रयोगशाला संबंधी बाधाएं मौजूद हैं। लेकिन AI मॉडल जैसे-जैसे ज्यादा सक्षम, सस्ते और व्यापक रूप से उपलब्ध होंगे, बायो-सिक्योरिटी और बायोसेफ्टी के सवाल और महत्वपूर्ण होते जाएंगे।
AI और ऑटोमेटेड लैब से बढ़ सकती है चुनौती
भविष्य में अगर AI सिस्टम को ऑटोमेटेड लैबोरेटरी उपकरणों और जैविक प्रयोगों से जोड़ दिया जाता है, तो रिसर्च की गति काफी बढ़ सकती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक प्रगति के साथ सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है। जरूरी सवाल यह है कि AI की जैविक क्षमताओं पर किस तरह की निगरानी हो, कौन से प्रयोग प्रतिबंधित हों और यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि शक्तिशाली तकनीक का इस्तेमाल गलत हाथों में न जाए। आज AI से डिजाइन किए गए जैविक सिस्टम एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया के खिलाफ संभावित नई उम्मीद दिखा रहे हैं। लेकिन यही क्षमता अगर पर्याप्त सुरक्षा और निगरानी के बिना विकसित होती है तो भविष्य में जैविक सुरक्षा के लिए नई चुनौती भी बन सकती है। इसलिए AI और बायोलॉजी का मेल केवल मेडिकल क्रांति का सवाल नहीं है। यह वैज्ञानिक प्रगति, नैतिकता, बायोसेफ्टी और वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी है।




