पटना, 13 अगस्त 2026 : बिहार में शराबबंदी को लेकर सरकार ने अपना रुख एक बार फिर साफ कर दिया है। मद्य निषेध मंत्री मदन सहनी ने साफ कहा है कि राज्य में लागू शराबबंदी कानून में फिलहाल किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिहार में शराब पहुंचाने वाली कंपनियों पर भी कानूनी कार्रवाई होगी और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ FIR दर्ज की जाएगी। मंत्री के इस बयान के बाद बिहार में शराबबंदी को लेकर सियासी बहस फिर तेज हो गई है।
शराबबंदी कानून में नहीं होगा बदलाव
मंत्री मदन सहनी ने कहा कि बिहार में शराबबंदी पहले की तरह लागू रहेगी। राज्य सरकार का फिलहाल कानून में संशोधन करने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि शराबबंदी को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कार्रवाई का दायरा और बढ़ाया जा सकता है। मंत्री के मुताबिक, अब सिर्फ शराब की बिक्री या सप्लाई करने वाले स्थानीय लोगों पर ही कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि बिहार में शराब पहुंचाने वाले ब्रांड और संबंधित कंपनियों पर भी शिकंजा कसा जाएगा।
शराब बिहार पहुंची तो कंपनी पर भी FIR
मद्य निषेध मंत्री ने कहा कि अगर किसी कंपनी का विदेशी या अन्य ब्रांड का शराब उत्पाद बिहार में पहुंचता है, तो संबंधित कंपनी के खिलाफ भी FIR दर्ज कराई जाएगी। उन्होंने दावा किया कि ऐसी कार्रवाई की शुरुआत हो चुकी है। सरकार का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब बिहार में शराब की अवैध सप्लाई और शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
10 साल की हुई बिहार की शराबबंदी
बिहार में पूर्ण शराबबंदी एक अप्रैल 2016 को लागू की गई थी। सरकार के मुताबिक इस फैसले का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और परिवारों को शराब के दुष्प्रभाव से बचाना था। मदन सहनी ने शराबबंदी के सामाजिक प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि पहले कई परिवारों में कमाई का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च हो जाता था। इसका असर परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता था।
'500 रुपये कमाने वाला 250 रुपये नशे में खर्च करता था'
मंत्री मदन सहनी ने उदाहरण देते हुए कहा कि रोजाना 500 रुपये कमाने वाला व्यक्ति कई बार अपनी कमाई का आधा हिस्सा नशे पर खर्च कर देता था। ऐसे में परिवार की जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसा नहीं बचता था। उनका दावा है कि शराबबंदी के बाद लोगों की आय का इस्तेमाल परिवार की जरूरतों, बच्चों की पढ़ाई और घरेलू खर्च में ज्यादा होने लगा है। साथ ही लोगों की सेहत भी ठीक है।
NCAER की रिपोर्ट के बाद फिर चर्चा में शराबबंदी
बिहार की शराबबंदी को लेकर हाल में NCAER की रिसर्च के बाद बहस और तेज हो गई है। अध्ययन में शराबबंदी के सामाजिक प्रभावों, खासकर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और घरेलू हिंसा से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिसर्चर्स के मुताबिक उपलब्ध आंकड़ों से यह स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकलता कि शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित कमी आई है। कुछ श्रेणियों में अपराधों की रिपोर्टिंग बढ़ने की बात भी अध्ययन में सामने आई है, जो चौंकाने वाला है।
NDA में भी अलग-अलग राय
शराबबंदी को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं के बीच भी समय-समय पर अलग-अलग राय सामने आती रही है। जेडीयू शराबबंदी के समर्थन में रही है, जबकि जेडीयू विधायक अनंत सिंह कई बार कानून को खत्म करने की मांग कर चुके हैं। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि कानून सही है मगर इसके अमल में पुलिस-प्रशासन के स्तर पर समस्याएं हैं। दूसरी ओर सरकार के कई नेता शराबबंदी को सामाजिक बदलाव से जोड़ते हैं और दावा करते हैं कि इससे परिवारों की आर्थिक स्थिति में पहले से सुधार हुआ है।
विपक्ष भी लगातार सरकार को घेर रहा
शराबबंदी को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार हमला करता रहा है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर का आरोप है कि शराबबंदी के बावजूद राज्य में अवैध शराब का कारोबार और भ्रष्टाचार बढ़ा है।आरजेडी भी सरकार पर अवैध शराब की सप्लाई रोकने में विफल रहने का आरोप लगाती रही है। विपक्ष का दावा है कि राज्य में अवैध तरीके से शराब की सप्लाई जारी है। हालांकि, मद्य निषेध मंत्री मदन सहनी ने अब सरकार की स्थिति स्पष्ट कर दी है कि बिहार में शराबबंदी कानून में कोई बदलाव नहीं होगा और शराब की सप्लाई करने वाली कंपनियों पर भी कार्रवाई की जाएगी।




