पटना, 27 सितंबर। पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है। इस दौरान पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में किए गए इन कर्मों से पितरों का स्मरण और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी क्रम में शाम के समय दीपक जलाने की भी परंपरा है।
पितृ पक्ष में शाम को दीपक जलाने की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान शाम के समय घर के मुख्य द्वार, दक्षिण दिशा या पीपल के पेड़ के पास दीपक जलाया जाता है। इसे पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। संध्या के समय दीपक जलाने की परंपरा कई परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही है।
पितरों को मार्ग दिखाने से जुड़ी मान्यता
मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज सूक्ष्म रूप में अपने परिजनों के पास आते हैं। ऐसे में शाम के समय जलाया गया दीपक प्रकाश का प्रतीक माना जाता है और इसे पितरों को मार्ग दिखाने से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है।
दक्षिण दिशा में दीपक क्यों जलाते हैं?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा का संबंध पितरों और यमराज से माना जाता है। इसलिए पितृ पक्ष के दौरान दक्षिण दिशा में दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, इससे पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है और परिवार में सुख-शांति की कामना की जाती है।
पितृ दोष से भी जोड़ा जाता है दीपदान
ज्योतिषीय मान्यताओं में पितृ दोष को पूर्वजों से जुड़ा एक दोष माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में श्रद्धापूर्वक दीपदान करने से इसके प्रभाव कम करने में सहायता मिल सकती है। इसे आस्था आधारित उपाय के रूप में ही समझना चाहिए।
दीपक जलाते समय रखें इन बातों का ध्यान
पितरों के निमित्त दीपक जलाते समय मिट्टी का साफ और साबुत दीपक इस्तेमाल करने की परंपरा है। इसमें तिल या सरसों का तेल अथवा घी डाला जा सकता है। दीपक जलाने के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूर्वजों का स्मरण और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करने की मान्यता है। इस दौरान आसपास स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी माना जाता है।




