पटना, 25 सितंबर 2026 । जमुई में नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ और बदसलूकी का मामला अब राजनीतिक और कानूनी विवाद के नए दौर में पहुंच गया है। इस मामले में पुलिस कार्रवाई और आरोपियों की गिरफ्तारी के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े कर दिए हैं। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सीएम सम्राट चौधरी पर जमकर हमला बोला है। सीएम ने जमुई मामले की नाबालिग पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की थी। पोस्ट में उन्होंने परिवार को न्याय का भरोसा दिलाया और आरोपियों के खिलाफ तेज कार्रवाई की बात कही। पोस्ट बाद में हटा दी गई, लेकिन उसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर सामने आ गया है। इस पर तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया है कि तस्वीर सार्वजनिक करने से नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर हो सकती है। उन्होंने POCSO Act के प्रावधानों का हवाला देते हुए सीएम सम्राट चौधरी की पोस्ट पर कार्रवाई की मांग की है।

क्या था मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का पोस्ट?

रिपोर्टों के मुताबिक, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 24 सितंबर को पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात की। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में परिवार को न्याय का भरोसा दिलाया और कहा कि आरोपियों के खिलाफ स्पीडी ट्रायल के जरिए कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। पोस्ट के साथ मुलाकात की तस्वीर भी साझा की गई थी। RJD की ओर से आरोप लगाया गया है कि तस्वीर में पीड़िता अथवा परिवार से जुड़ी ऐसी जानकारी दिखाई दे रही थी, जिससे नाबालिग की पहचान सामने आ सकती है। बाद में यह पोस्ट हटा दी गई। हालांकि, पोस्ट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगा।

तेजस्वी यादव ने क्या आरोप लगाया ?

मुख्यमंत्री की पोस्ट सामने आने के बाद तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि POCSO Act नाबालिग पीड़ित की पहचान की सुरक्षा करता है और मुख्यमंत्री की ओर से तस्वीर साझा किया जाना इसी प्रावधान के खिलाफ हो सकता है। तेजस्वी ने मुख्यमंत्री पर कार्रवाई की मांग करते हुए सवाल उठाया कि जब पुलिस उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है जिन्होंने वायरल वीडियो के जरिए पीड़िता की पहचान उजागर की, तो सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से साझा की गई तस्वीर की भी कानूनी जांच होनी चाहिए। RJD की ओर से साझा किए गए पोस्ट में POCSO Act का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री पर FIR की मांग भी की गई है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि तेजस्वी यादव का आरोप अपने आप में यह साबित नहीं करता कि POCSO Act का उल्लंघन हुआ है। तस्वीर से वास्तव में पहचान स्थापित होती है या नहीं और धारा 23 के तहत उसकी कानूनी स्थिति क्या होगी, यह तथ्य और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय होगा।

POCSO की धारा 23 क्या कहती है?

POCSO Act, 2012 की धारा 23 नाबालिग पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करने से जुड़ी महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। कानून के मुताबिक किसी मीडिया रिपोर्ट में बच्चे की पहचान उजागर नहीं की जा सकती। इसमें बच्चे का नाम, पता, फोटो, परिवार की जानकारी, स्कूल, पड़ोस या ऐसी कोई दूसरी जानकारी शामिल है, जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती है। हालांकि, कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है। POCSO की धारा 23(2) के तहत संबंधित Special Court लिखित कारण दर्ज करके ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने की अनुमति दे सकती है, अगर अदालत को लगे कि ऐसा करना बच्चे के हित में है। धारा 23(4) के अनुसार धारा 23(1) या 23(2) के प्रावधानों का उल्लंघन होने पर कम से कम छह महीने और अधिकतम एक साल तक की जेल, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है। इसके अलावा POCSO की धारा 24(5) में भी पुलिस को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि बच्चे की पहचान सार्वजनिक मीडिया से सुरक्षित रहे, जब तक Special Court अलग निर्देश न दे।

जमुई मामले में पहले से पहचान उजागर करने पर पुलिस कार्रवाई

इस विवाद को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि जमुई मामले में पुलिस पहले वायरल वीडियो के जरिए नाबालिग की पहचान सामने आने के मामले में कार्रवाई कर चुकी है। पुलिस ने 120 सोशल मीडिया प्रोफाइलों के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की जानकारी दी थी। आरोप था कि इन अकाउंट्स से ऐसा वीडियो प्रसारित किया गया जिसमें नाबालिग पीड़िता की पहचान सामने आ रही थी। पुलिस ने लोगों से वीडियो को डाउनलोड, शेयर या रीपोस्ट नहीं करने की अपील की थी। इस कार्रवाई के बीच सीएम की तस्वीर को लेकर उठे सवाल ने मामले को राजनीतिक रूप से और संवेदनशील बना दिया है।

19 सितंबर को क्या हुआ था ?

पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 19 सितंबर को जमुई में एक नाबालिग लड़की और उसके नाबालिग पुरुष साथी को कुछ युवकों ने कथित तौर पर रोका। दोनों के साथ मारपीट और बदसलूकी किए जाने का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। पुलिस ने वीडियो और अन्य डिजिटल सुरागों के आधार पर आरोपियों की पहचान शुरू की। मामले की जांच के लिए SIT भी गठित की गई।पुलिस के मुताबिक मामले में 7 संदिग्ध आरोपियों की पहचान की गई थी। कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। मुख्य आरोपी बताए जा रहे नंदन यादव को 23 सितंबर को पुलिस कार्रवाई के दौरान पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।

वायरल वीडियो को लेकर पुलिस की अलग कार्रवाई

जमुई पुलिस ने मूल घटना की जांच के साथ-साथ वीडियो के डिजिटल प्रसार को भी जांच के दायरे में रखा है। पुलिस के मुताबिक, करीब 120 सोशल मीडिया प्रोफाइलों के खिलाफ कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उन पर ऐसे वीडियो के प्रसार का आरोप था, जिसमें नाबालिग की पहचान उजागर होने का खतरा था। अधिकारियों ने लोगों को वीडियो को आगे साझा न करने की चेतावनी दी थी। यानी इस मामले में दो अलग-अलग कानूनी पहलू हैं—पहला, नाबालिग लड़की के साथ कथित अपराध की जांच और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई; दूसरा, घटना के वीडियो या ऐसी सामग्री का प्रसार जिससे पीड़िता की पहचान सामने आ सकती है।

अब मुख्यमंत्री की तस्वीर पर क्या होगा?

मुख्यमंत्री की ओर से पोस्ट हटाए जाने के बाद भी तस्वीर का स्क्रीनशॉट सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है। विपक्ष ने इसे POCSO के तहत जांच का विषय बताया है। मगर अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि मुख्यमंत्री की पोस्ट के खिलाफ POCSO के तहत अपराध सिद्ध हो गया है। इसके लिए यह निर्धारित करना जरूरी होगा कि तस्वीर में दिखाई गई जानकारी से वास्तव में नाबालिग की पहचान स्थापित होती है या नहीं, पोस्ट किस संदर्भ में की गई थी और कानून की संबंधित धाराएं उस स्थिति में किस तरह लागू होती हैं।

जमुई मामले में अब दो मोर्चों पर जांच

जमुई प्रकरण में अब जांच केवल मुख्य घटना तक सीमित नहीं है। एक तरफ पुलिस कथित छेड़छाड़ और मारपीट में शामिल आरोपियों की भूमिका की जांच कर रही है, वहीं दूसरी ओर वायरल वीडियो और नाबालिग की पहचान उजागर करने वाली सामग्री के प्रसार पर भी कार्रवाई की जा रही है। इसी बीच सीएम की सोशल मीडिया पोस्ट ने नाबालिग पीड़िता की पहचान की गोपनीयता, POCSO के प्रावधानों और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर नया विवाद खड़ा कर दिया है।