पटना, 12 सितंबर 2026 : बिहार की सियासत में JDU के अंदरूनी समीकरण को लेकर चर्चा काफी तेज हो गई है। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के एक बयान ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खगड़िया में आयोजित नीतीश संवाद कार्यक्रम में संजय झा ने कहा कि अब समय आ गया है कि JDU का नाम बदलकर ‘जनता दल (नीतीश)’ कर दिया जाए। संजय झा के इस बयान के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या JDU में भी किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार हो रही है ? क्या पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ रही है या फिर यह कदम सिर्फ नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित रखने की कोशिश है ?

पहले पढ़िए JDU के दो बड़े नेताओं के बयान

इस बीच JDU विधायक दल के नेता श्रवण कुमार ने कहा है कि पार्टी नीतीश कुमार के नेतृत्व में स्थापित हुई और लोग उनके नेतृत्व की वजह से पार्टी से जुड़े हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि नाम बदलने का प्रस्ताव आने पर उसे सर्वसम्मति से पास किया जा सकता है। वहीं डिप्टी सीएम बिजेंद्र प्रसाद यादव ने इसे संजय झा की निजी इच्छा बताया। उन्होंने साफ कहा कि जब जदयू के सामने औपचारिक प्रस्ताव आएगा, तब उस समय पार्टी इस पर अपना फैसला करेगी।

क्या JDU में कांग्रेस जैसी टूट का खतरा ?

संजय झा के बयान के बाद कांग्रेस के पुराने विभाजन का उदाहरण भी चर्चा में आ गया है। 1978 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला गुट कांग्रेस (I) के नाम से अलग हुआ था, जबकि दूसरे धड़े को कांग्रेस (U) कहा गया। अब राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सवाल है कि क्या JDU में भी किसी तरह के गुटीय समीकरण बन रहे हैं ? हालांकि JDU के नेता आधिकारिक तौर पर पार्टी में किसी टूट या बड़ी गुटबाजी की बात को खारिज करते हैं। राजनीतिक चर्चाओं में संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के बीच प्रभाव और सक्रियता को लेकर भी अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।

नीतीश के नाम के पीछे क्या है ‘विरासत’ की राजनीति ?

JDU के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती नीतीश कुमार के बाद पार्टी की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की है। पूर्व सीएम नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं, लेकिन उनके बाद पार्टी का नेतृत्व किस दिशा में जाएगा, यह बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है। इसी वजह से पार्टी के नाम में नीतीश कुमार का नाम जोड़ने की चर्चा को सिर्फ संगठनात्मक बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा है बल्कि इसे पार्टी के अंदरखाने कुछ अलग चलने का साफ संकेत है।

JDU में गुटबाजी की चर्चा क्यों ?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं की सक्रियता काफी बढ़ी है। एक तरफ संजय झा फरक्का जल संधि के मुद्दे पर लगातार आक्रामक रुख अपना रहे हैं और बिहार के अलग-अलग हिस्सों में कार्यक्रम कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत कम सक्रियता को लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। हालांकि JDU की ओर से आधिकारिक तौर पर दोनों नेताओं के बीच किसी विवाद या टकराव की पुष्टि नहीं की गई है, मगर मामला जरूर गंभीर दिख रहा है।

क्या नीतीश की विरासत पर दूसरे नेता भी कर रहे दावा ?

नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को लेकर सिर्फ JDU ही नहीं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों के नेता भी बयान दे रहे हैं। JDU की ओर से निशांत कुमार को सक्रिय राजनीति में लाने की चर्चा के बीच पूर्व सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा ने भी नीतीश की विरासत को लेकर अपनी बात रखी है। 20 अगस्त को राजगीर में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के कार्यक्रम में कुशवाहा ने कहा था कि नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को आगे कौन बढ़ाएगा, यह बड़ा सवाल है। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि विरासत का अर्थ किसी व्यक्ति या पार्टी पर दावा नहीं, बल्कि किसी नेता के विचारों और कार्यों को आगे बढ़ाना है।

NCP, शिवसेना और LJP में हो चुकी है बड़ी टूट

भारतीय राजनीति में पार्टियों के भीतर टूट और नाम बदलने के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं।

NCP : जुलाई 2023 में शरद पवार की NCP में विभाजन हुआ और अजित पवार के नेतृत्व वाला गुट अलग हुआ।

शिवसेना : 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में बड़ा विभाजन हुआ। बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दिया।

LJP : जून 2021 में रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी दो धड़ों में बंट गई। चिराग पासवान के नेतृत्व में LJP (रामविलास) और पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में अलग राजनीतिक संगठन सामने आया।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल—क्या JDU सच में टूट की ओर ?

संजय झा के बयान ने निश्चित तौर पर JDU के भीतर नीतीश कुमार की विरासत, नेतृत्व और भविष्य के संगठनात्मक ढांचे को लेकर बहस तेज कर दी है। हालांकि अभी तक पार्टी में किसी औपचारिक टूट की घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि ‘जनता दल (नीतीश)’ नाम की चर्चा सिर्फ नीतीश की विरासत मजबूत करने की रणनीति है या JDU के भीतर आने वाले किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है ? कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जेडीयू के अंदर सबकुछ ठीक नहीं है।